हम राजनीतिक पंडितों की एक बुरी आदत यह है कि हम चर्चाओं में इतने उलझकर रह जाते हैं कि असली विषय कहीं खो जाता है। श्री श्री रविशंकर के महा उत्सव पर भी ऐसा ही हुआ। इस प्रसिद्ध धर्मगुरु ने दिल्ली में यमुना किनारे इस महा उत्सव का आयोजन किया। उन्होंने अपने भाषण में यमुना की दुर्दशा का जिक्र किया। जैसे उन्होंने यह कहा कि मां यमुना को नहलाने यानी उसे साफ करने का समय आ गया है। लेकिन इसमें शामिल होने आए अपने लाखों अनुयायियों से श्री श्री अगर थोड़ी कारसेवा कराते, तो ज्यादा अच्छा होता।
दिल्ली में यमुना नदी का इतना बुरा हाल है कि पर्यावरणविद इसे मृत नदी मानते हैं। दिल्ली के अलग-अलग हिस्सों में यह आज नाले के रूप में ही जीवित है। यमुना को जीवित करने के कई प्रयास हुए हैं, लेकिन वे सभी प्रयास विफल रहे हैं, क्योंकि इसका जिम्मा उन राजनेताओं और सरकारी कर्मचारियों को दिया गया, जिन्हें यमुना की परवाह कम और अपनी जेब भरने की चिंता ज्यादा रही है। मामला सिर्फ यमुना का ही नहीं है, गंगा समेत दूसरी नदियों का यही हाल है। सच्चाई यह है कि यमुना को स्वच्छ करने में अब तक लाखों-करोड़ों रुपये खर्च हो गए हैं। अनेक लोगों ने इसे साफ करने के प्रयास किए, धन का आवंटन हुआ, योजनाएं बनाई गईं, लेकिन इसका जल पहले से भी अधिक प्रदूषित हो गया है, क्योंकि दिल्ली शहर के तमाम गंदे नालों से इसमें रोज गंदगी गिराई जाती है। अच्छा होता, यदि श्री श्री अपने अनुयायियों को यमुना की दुर्दशा से उन्हें परिचित कराते। यह बात जब मैंने श्री श्री के एक भक्त से कही, तो उसका जवाब था कि श्री श्री ने बहुत पहले से यमुना की सफाई का जिम्मा संभाल रखा है। उसने यह भी कहा कि श्री श्री ने दक्षिण भारत की कई नदियों को कारसेवा के जरिये स्वच्छ करने का महत्वपूर्ण काम भी किया है।
ऐसा नहीं है कि नदियों को स्वच्छ नहीं किया जा सकता। ऐसा हुआ है। नदियों को स्वच्छ करने का ज्ञान कुछ मुट्ठी भर अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के पास है। वस्तुतः पश्चिम यूरोप और अमेरिका की कुछ नदियां इस ज्ञान के बदौलत ही साफ हो पाई हैं। श्री श्री के भक्तों के पास यह ज्ञान है या नहीं, कह नहीं सकते, लेकिन वे राज्य सरकारों पर दबाव तो बना ही सकते हैं, ताकि नगरपालिकाओं के गंदे पानी को नदियों में गिराने पर रोक लगाई जा सके। अगर यह काम बहुत पहले शुरू हुआ होता, तो आज हमारी नदियों का पानी थोड़ा-बहुत स्वच्छ तो हो ही चुका होता। गौरतलब है कि हमारी अपनी परंपरा में नदियों में गंदी चीजें डालने की मनाही रही है। हमारे पुरखे बहुत कठोरता से इसका पालन भी करते आए हैं। यह प्रथा अंग्रेजी राज के समय तब टूटी, जब नालों का पानी नदियों में छोड़ा जाने लगा। अंग्रेज चले गए, लेकिन उस गलत व्यवस्था को बदलने की कोई कोशिश नहीं हुई। श्री श्री जैसे धर्मगुरु अगर इस प्रथा के खिलाफ खड़े हों, तो निस्संदेह समाज में उसका नैतिक असर होगा।
श्री श्री जैसे समर्थ धर्मगुरु निश्चित रूप से समाज को नई दिशा देने का काम कर सकते हैं। यमुना किनारे आयोजित उनके समारोह पर उठी आवाज को देखते हुए उन्होंने यमुना तट को बेहतर बनाने का संकल्प लिया है। उम्मीद करनी चाहिए कि श्री श्री और उनके अनुयायी यमुना की बदहाली को दूर करने की दिशा में कुछ करेंगे।