तमिलनाडु में संसार की इस सबसे बड़ी पार्टी के लिए अभी भी मुकाबला आसान नहीं है। सिर्फ दो फीसदी मत प्रतिशत के सहारे वह क्या उम्मीद करे? अगर कोई संभावना बीजेपी का वोट बैंक बढ़ने की हो सकती है तो सत्तारूढ़ ऑल इंडिया अन्ना द्रमुक मुनेत्र कषगम (एआईएडीएमके) के नकारात्मक वोट, पार्टी में अंदरूनी खींचतान और नेत्री जयललिता का नहीं होना है। विधानसभा में हाजिरी लगाने के लिए ये कारण पर्याप्त हैं। पुड्डुचेरी में भी इस बार दल की उम्मीदें जगी हैं। उसने कांग्रेस की सरकार गिराई है तो स्पष्ट है कि राष्ट्रपति शासन में निर्वाचन होने का फायदा मिलेगा। उसे नक्शे में अपनी दमदार हाजिरी लगाने का अवसर इसलिए भी मिल सकता है क्योंकि पूर्व विधानसभा अध्यक्ष और कांग्रेस के कुछ बड़े विधायक टूट कर उसके पाले में आ सकते हैं। इसके अलावा उसका गठबंधन एआईएनआरसी से है, जिसके करीब 28-30 प्रतिशत वोट पक्के रहते हैं। इस दल के सुप्रीमो पूर्व मुख्यमंत्री एन. रंगास्वामी हैं। उनकी छबि अच्छी है। वे लोकप्रिय हैं। बीजेपी की योजना कामयाब रही तो वे पुड्डुचेरी के अगले नाविक हो सकते हैं।
केरल अभी भी भारतीय जनता पार्टी के लिए टेढ़ी खीर है। हालांकि पिछले चुनाव में उसने लगभग साढ़े दस प्रतिशत वोट पाए थे और खाता भी खोला था। इस बार संघ की मदद कितना जनाधार बढ़ाती है। यदि पार्टी दहाई में पहुंचती है तो यह भी करिश्मा ही होगा।
कांग्रेस को अब क्या खोना है ?
कांग्रेस के लिए इन पांचों राज्यों में खोने के लिए कुछ नहीं है। एक पुड्डुचेरी में सरकार बची थी। वह भी चली गई। इसलिए उसके नजरिए से तो सारी इबारत एकदम साफ-साफ लिखी हुई है। चुनाव दर चुनाव उसका जनाधार खिसकता जा रहा है। सीटें कम होती जा रही हैं। अपने दम पर वह किसी भी राज्य में सरकार बनाने की स्थिति में नहीं है। अकेले पुड्डुचेरी में उसकी सीटें 15 और वोट 30 फीसदी थे । इसके ऊपर जाने की कोई सूरत नजर नहीं आती। इसे ही पार्टी बचा ले तो बड़ी बात है। केरल में उसके 22 विधायक चुने गए थे और मतों का प्रतिशत 22 था। असम में अलबत्ता 31 फीसदी वोटों के साथ 26 सीटों पर उसे कामयाबी मिली थी। तमिलनाडु में लगभग साढ़े छह प्रतिशत मतों के ढेर पर वह खड़ी है। इस बार द्रमुक के आसार बेहतर हैं तो वह अवश्य कुछ हासिल कर सकती है। बंगाल में पिछली बार की तरह उसने फिर वाम दलों के साथ जाने का अदूरदर्शी फैसला लिया है। पिछली बार उसने 12 प्रतिशत मत के साथ 44 स्थानों पर जीत हासिल की थी। यह वाम दलों से बारह सीट ज्यादा थी। इस बार अधीर रंजन चौधरी के लिए अग्नि परीक्षा की घड़ी है। वे कितना जनाधार बढ़ा सकते हैं। सीटों में तो कोई बहुत बढ़ोत्री के आसार फिलहाल नहीं लगते।