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विधानसभा चुनाव 2021: शिखर पार्टियों के लिए बड़ी चुनौतियांं

राजेश बादल
Updated Tue, 02 Mar 2021 12:09 PM IST
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विधानसभा चुनाव 2021 - फोटो : iStock
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पांच प्रदेशों में चुनावी सरगर्मियां दिनों दिन तेज हो रही हैं। इस बार कमोबेश सारे दल अंदरुनी द्वंद्व और चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। इनमें केरल, तमिलनाडु तथा बंगाल ऐसे हैं, जिनमें दोनों राष्ट्रीय शिखर पार्टियां मुख्य भूमिका में नहीं हैं। वहां क्षेत्रीय दलों ने दशकों से अपने पैर मजबूती से टिकाए हुए हैं। केंद्र में अपने बूते पहली बार बहुमत में आई भारतीय जनता पार्टी को इन प्रदेशों में अपने अंकुरण को पालना पोसना है तो कांग्रेस को खिसकता  जनाधार रोकना है।

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इन कोशिशों में दोनों दलों ने लोकतंत्र के इस सबसे बड़े अनुष्ठान में कुछ स्याह आहुतियां भी डाली हैं। इसी तरह क्षेत्रीय पार्टियों के नेतृत्व पहली बार कड़ी अग्निपरीक्षा से गुजरेंगे। यह चुनाव इस जनतांत्रिक अनुष्ठान का भी अलग ढंग से इम्तिहान ले रहा है। अपने कार्यों के आधार पर नहीं, बल्कि चुनाव दर चुनाव तिकड़मों के जरिए बहुमत जुटाने का हुनर हुक्मरानों ने अमल में लाना शुरू कर दिया है। इससे संसदीय निर्वाचन प्रणाली भी कई मुश्किलों का सामना करती दिखाई देती है, यानी लोकतंत्र के ये घटक अपने अपने ढंग से एक जैसे सवालों का सामना कर रहे हैं।

बड़ी कामयाबी, बड़े सवाल 

देखा जाए तो भारतीय जनता पार्टी के लिए ये सवाल विकराल हैं, क्योंकि उसकी पिछले निर्वाचन में सफलता भी बड़ी थी। हालांकि उसमें उत्तर भारत का रिकॉर्ड योगदान था। इसलिए सवाल जायज है कि लोकसभा के लिए प्राप्त वोट प्रतिशत क्या विधानसभाओं में भी सुरक्षित रहेगा? एक तरह से यह केंद्र सरकार के कामकाज का लिटमस टेस्ट भी माना जा सकता है। देखना दिलचस्प होगा कि उत्तर पूर्व और दक्षिण भारत में जनाधार बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास कर रही बीजेपी क्या कांग्रेस के पुराने आकार में पहुंचेगी। उत्तर पूर्व के प्रदेश असम में पिछले विधानसभा चुनाव में 2014 के लोकसभा निर्वाचन के नतीजों ने भी असर डाला था। प्रधानमंत्री के रूप में असम से ही निर्वाचित डॉक्टर मनमोहन सिंह के मुकाबले अपेक्षाकृत वाचाल प्रधानमंत्री के चेहरे को लोगों ने पसंद किया था।इसके अलावा कांग्रेस में बीजेपी ने जबरदस्त सेंध लगाई थी। कांग्रेस में तरुण गोगोई के कारण उपेक्षित हेमंत विस्व शर्मा को पार्टी ने खींच लिया। इससे कांग्रेस संगठन कमजोर पड़ गया और बीजेपी को 60 सीटों पर चमत्कारिक जीत मिली। इस बार पांच साल का नकारात्मक वोट सामने है। हेमंत शर्मा को मुख्यमंत्री नहीं बनाने से वे दुखी हैं। करीब तीस फीसदी वोट बैंक को बचाए रखने की चुनौती है।
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कांटे की टक्कर बंगाल में  

बीजेपी के लिए सर्वाधिक कांटे की स्थिति बंगाल में है। ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के किले में सेंध की कोशिशें पार्टी ने असम की तर्ज पर शुरू कर दी हैं। ममता भी उतने ही आक्रामक अंदाज में उत्तर दे रही हैं। उन्हें पांच साल के दौरान सरकार से नाराज लोगों को संभालना है और करीब पैंतालीस फीसदी वोटबैंक भी बचा कर रखना है। बीजेपी को पिछले विधानसभा चुनाव में केवल 3 स्थानों पर संतोष करना पड़ा था। अलबत्ता उसका मत प्रतिशत दस फीसदी के आसपास था। इस बार चुनौती वोट बैंक बढ़ाने की नहीं है। असल प्रश्न यह है कि क्या वह अपने दम पर सरकार बनाएगी? लोकसभा चुनाव 2019 के परिणाम उसका हौसला बढ़ाते हैं। यद्यपि ममता ने इसे बंगाल की अस्मिता से जोड़ दिया है। इस कारण स्थिति जटिल है। 

तमिलनाडु में संसार की इस सबसे बड़ी पार्टी के लिए अभी भी मुकाबला आसान नहीं है। सिर्फ दो फीसदी मत प्रतिशत के सहारे वह क्या उम्मीद करे? अगर कोई संभावना बीजेपी का वोट बैंक बढ़ने की हो सकती है तो सत्तारूढ़ ऑल इंडिया अन्ना द्रमुक मुनेत्र कषगम (एआईएडीएमके) के नकारात्मक वोट, पार्टी में अंदरूनी खींचतान और नेत्री जयललिता का नहीं होना है। विधानसभा में हाजिरी लगाने के लिए ये कारण पर्याप्त हैं। पुड्डुचेरी में भी इस बार दल की उम्मीदें जगी हैं। उसने कांग्रेस की सरकार गिराई है तो स्पष्ट है कि राष्ट्रपति शासन में निर्वाचन होने का फायदा मिलेगा। उसे नक्शे में अपनी दमदार हाजिरी लगाने का अवसर इसलिए भी मिल सकता है क्योंकि पूर्व विधानसभा अध्यक्ष और कांग्रेस के कुछ बड़े विधायक टूट कर उसके पाले में आ सकते हैं। इसके अलावा उसका गठबंधन एआईएनआरसी से है, जिसके करीब 28-30 प्रतिशत वोट पक्के रहते हैं। इस दल के सुप्रीमो पूर्व मुख्यमंत्री एन. रंगास्वामी हैं। उनकी छबि अच्छी है। वे लोकप्रिय हैं। बीजेपी की योजना कामयाब रही तो वे पुड्डुचेरी के अगले नाविक हो सकते हैं। 

केरल अभी भी भारतीय जनता पार्टी के लिए टेढ़ी खीर है। हालांकि पिछले चुनाव में उसने लगभग साढ़े दस प्रतिशत वोट पाए थे और खाता भी खोला था। इस बार संघ की मदद कितना जनाधार बढ़ाती है। यदि पार्टी दहाई में पहुंचती है तो यह भी करिश्मा ही होगा।

कांग्रेस को अब क्या खोना है ?

कांग्रेस के लिए इन पांचों राज्यों में खोने के लिए कुछ नहीं है। एक पुड्डुचेरी में सरकार बची थी। वह भी चली गई। इसलिए उसके नजरिए से तो सारी इबारत एकदम साफ-साफ लिखी हुई है। चुनाव दर चुनाव उसका जनाधार खिसकता जा रहा है। सीटें कम होती जा रही हैं। अपने दम पर वह किसी भी राज्य में सरकार बनाने की स्थिति में नहीं है। अकेले पुड्डुचेरी में उसकी सीटें 15 और वोट 30 फीसदी थे । इसके ऊपर जाने की कोई सूरत नजर नहीं आती। इसे ही पार्टी बचा ले तो बड़ी बात है। केरल में उसके 22 विधायक चुने गए थे और मतों का प्रतिशत 22 था। असम में अलबत्ता 31 फीसदी वोटों के साथ 26 सीटों पर उसे कामयाबी मिली थी। तमिलनाडु में लगभग साढ़े छह प्रतिशत मतों के ढेर पर वह खड़ी है। इस बार द्रमुक के आसार बेहतर हैं तो वह अवश्य कुछ हासिल कर सकती है। बंगाल में पिछली बार की तरह उसने फिर वाम दलों के साथ जाने का अदूरदर्शी फैसला लिया है। पिछली बार उसने 12 प्रतिशत मत के साथ 44 स्थानों पर जीत हासिल की थी। यह वाम दलों से बारह सीट ज्यादा थी। इस बार अधीर रंजन चौधरी के लिए अग्नि परीक्षा की घड़ी है। वे कितना जनाधार बढ़ा सकते हैं। सीटों में तो कोई बहुत बढ़ोत्री के आसार फिलहाल नहीं लगते। 
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