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जीवन धारा: ऐसा ज्ञान बेकार है जो करुणा न जगाए, सूत्र- संवेदनशील बनें

ईश्वर चंद्र विद्यासागर Published by: Pavan Updated Tue, 02 Jun 2026 06:34 AM IST

सार

मनुष्य चाहे कितनी ही पुस्तकें पढ़ ले, उसके जाने के बाद लोग उसके शब्दों को नहीं, बल्कि यह याद रखते हैं कि उसने कितनों के आंसू पोंछे, कितनों को सहारा दिया और कितनों के लिए अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाई।
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ऐसा ज्ञान बेकार है जो करुणा न जगाए - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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जीवन का मूल्य इस बात में नहीं कि हमने कितना ज्ञान अर्जित किया है, बल्कि इस बात में है कि हमारे कारण कितने लोगों का दुख कम हुआ। मनुष्य इस संसार में जन्म केवल अपने लिए नहीं लेता। अगर उसका समस्त ज्ञान, सारी विद्वता और उपलब्धियां केवल उसके अहंकार की दीवारें ऊंची करने में लग जाएं, तो वह ज्ञान नहीं, सिर्फ बोझ है। मैं उस विद्या को अधूरी मानता हूं, जो मनुष्य के भीतर करुणा न जगाए। मैंने अपने जीवन में देखा है कि समाज विद्वानों का तो सम्मान करता है, मगर दुखियों की पीड़ा सुनने से बचता है। लोग शास्त्रों के पन्ने तो उलटते हैं, किंतु मनुष्य के हृदय को पढ़ने का प्रयास नहीं करते। मुझे सदैव यह लगा कि यदि शिक्षा हमें मनुष्य के दुख के प्रति संवेदनशील नहीं बनाती, तो वह केवल शब्दों का संग्रह है, प्रकाश नहीं।
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जब मैं छोटा था, तब मैंने गरीबी को बहुत करीब से देखा। मैंने उन रातों को जिया है, जब दीपक जलाने के लिए हमारे यहां तेल भी नहीं हुआ करता था और सड़क की मद्धिम रोशनी में पढ़ना पड़ता था। उस समय मैंने जाना कि ज्ञान का वास्तविक मूल्य क्या है। समाज में मैंने अनेक लोगों को देखा, जो धर्म और परंपरा की बड़ी-बड़ी बातें तो करते थे, किंतु एक विधवा के आंसू उन्हें विचलित नहीं करते थे। वे शास्त्रों की रक्षा में इतने व्यस्त हो गए थे कि मनुष्यता की रक्षा करना तक भूल गए। तब मेरे भीतर यह प्रश्न बार-बार उठता था कि अगर किसी व्यवस्था के कारण मनुष्य का जीवन अपमान और पीड़ा में डूब जाए, तो उस व्यवस्था की पवित्रता का क्या अर्थ रह जाता है? धर्म वह नहीं हो सकता, जो करुणा को कुचल दे। मनुष्य का कर्तव्य केवल सत्य को जानना नहीं, बल्कि अन्याय के सामने खड़े होने का साहस रखना भी है।

मेरे लिए जीवन का उद्देश्य पीड़ित मनुष्य की पीड़ा को थोड़ा कम कर देना है। यदि आपके कारण किसी निराश व्यक्ति को आशा मिले, किसी भूखे को भोजन मिले, अशिक्षित को शिक्षा मिले, अपमानित को सम्मान मिले, तो समझिए आपका जीवन सार्थक हुआ। सच्चा ज्ञान वही है, जो सिखाए कि हर मनुष्य का दुख हमारे अपने दुख से अलग नहीं है। हम सब एक-दूसरे से जुड़े हैं। मनुष्य चाहे कितनी ही पुस्तकें पढ़ ले, उसके जाने के बाद लोग उसके शब्दों को नहीं, उसके व्यवहार को याद रखते हैं। वे यह याद रखते हैं कि उसने कितनों के आंसू पोंछे, कितनों को सहारा दिया और कितनों के लिए अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाई।
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शिक्षा का अर्थ है-अपने भीतर ऐसी दृष्टि विकसित करना, जिससे हम हर मनुष्य में अपनी ही आत्मा का अंश देख सकें। यदि कभी तुम्हें यह निर्णय लेना पड़े कि अपनी प्रतिष्ठा या किसी पीड़ित की सहायता करने में से महत्वपूर्ण क्या है, तो सदैव मनुष्यता को चुनना। समाज की प्रशंसा क्षणिक होती है, किंतु किसी पीड़ित मनुष्य की आंखों में लौटती हुई आशा अमर होती है। वही तुम्हारे जीवन का सबसे बड़ा पुरस्कार होगा।

सूत्र- संवेदनशील बनें
जीवन की सार्थकता ज्ञान के संचय में नहीं, बल्कि दूसरों के दुखों को दूर करने में है। सच्चा मनुष्य वही है, जो शास्त्रों के पन्ने पलटने के बजाय इन्सानी दिल को पढ़े और अन्याय के खिलाफ खड़े होने का साहस रखे। सदैव प्रतिष्ठा से ऊपर मानवता और सेवा को चुनें। आपके जाने के बाद लोग आपकी उपलब्धियों को नहीं, बल्कि आपकी संवेदनशीलता को याद रखेंगे।
 
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