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जीवन धारा: जीवन को समझना है तो नदी के पास जाओ; सूत्र- परिवर्तन को स्वीकार करें

लाओ त्जु Published by: Pavan Updated Tue, 26 May 2026 07:46 AM IST

सार

मनुष्य के साथ मुश्किल यह है कि वह जीवन को नियंत्रित करना चाहता है। यहीं से उसका संघर्ष शुरू होता है। तुम चाहते हो कि शरीर कभी बूढ़ा न हो, लेकिन ऐसा होता नहीं है, क्योंकि जीवन एक नदी है, पत्थर नहीं।
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जीवन को समझना है तो नदी के पास जाओ - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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जब मनुष्य जीवन को पकड़ना चाहता है, तभी उसके हाथों से जीवन फिसलने लगता है। जो मुट्ठी बंद करता है, वह जल को खो देता है। जो हथेली खोल देता है, उसके पास पूरी नदी आ जाती है। मनुष्य संसार में आता है और हर वस्तु पर अपना नाम लिखना चाहता है। वह कहता है कि यह मेरा है, यह मेरा विचार है, यह मेरा प्रेम है, यह मेरी उपलब्धि हैै। लेकिन सोचिए, क्या आकाश कभी किसी का हुआ या नदी कभी किसी एक किनारे की हुई? जवाब है नहीं। नदी को देखो। वह अपने लिए नहीं बहती। कभी नहीं कहती कि वह महान है। वह पर्वतों से निकलती है, चट्टानों से टकराती है, खेतों को सींचती है और अंत में समुद्र में जाकर मिल जाती है। उसने अपनी इस पूरी यात्रा में कहीं यह नहीं कहा कि मैं रुकूंगी, क्योंकि मार्ग कठिन है। लेकिन मनुष्य कठिनाई आते ही ठहर जाता है। जबकि नदी बाधा आते ही अपना रास्ता बदल लेती है। कभी झरना बन जाती है, तो कभी धारा। यही बुद्धिमत्ता है।
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मनुष्य के साथ मुश्किल यह है कि वह जीवन को नियंत्रित करना चाहता है। यहीं से उसका संघर्ष शुरू होता है। तुम चाहते हो कि लोग वैसे ही रहें, जैसे तुम उन्हें देखना चाहते हो। तुम चाहते हो कि प्रेम कभी न बदले, शरीर कभी न बूढ़ा हो, लेकिन ऐसा होता नहीं है, क्योंकि जीवन एक नदी है, पत्थर नहीं। एक वृक्ष जब बहुत कठोर हो जाता है, तो आंधी उसे गिरा देती है। मगर, घास झुक जाती है, इसलिए बची रहती है। नदी को देखो। वह कभी पीछे मुड़ कर अपने स्रोत को नहीं खोजती। हमेशा आगे ही बहती है। इसलिए स्वच्छ रहती है।

जबकि मनुष्य स्मृतियों को ढोता रहता है, इसीलिए उसका मन मैला हो जाता है। मनुष्य का मन एक अशांत तालाब की तरह है। उसमें इच्छाओं की हवा चलती रहती है। इसीलिए वह अपने वास्तविक स्वरूप को नहीं देख पाता। जब जल शांत होता है, तभी उसमें आकाश दिखाई देता है। यदि तुम जीवन को समझना चाहते हो, तो नदी के पास जाओ। देखो कि जल कैसे बहता है। वह रुकता नहीं, शिकायत नहीं करता, घोषणा नहीं करता, फिर भी अपना मार्ग बना लेता है।
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ज्ञानी व्यक्ति जीवन से लड़ता नहीं है, वह उसके साथ चलता है। जब भूख लगे, खाओ। जब दुख आए, आने दो। जो आता है, वह जाएगा ही। और जो जाता है, वह किसी और रूप में लौटेगा। नदी हर क्षण बदलती है, फिर भी वही रहती है। मनुष्य भी ऐसा ही है। तुम अपने बचपन वाले व्यक्ति नहीं रहे। फिर तुम किसे बचाने की कोशिश कर रहे हो? जो स्वयं को स्थायी मानता है, वही सबसे अधिक भयभीत रहता है। जो परिवर्तन को स्वीकार कर लेता है, वह मुक्त हो जाता है। मुक्ति कहीं दूर नहीं है। वह उसी क्षण जन्म लेती है, जब तुम जीवन को नियंत्रित करने की कोशिश छोड़ देते हो। तब तुम पाओगे कि अस्तित्व तुम्हें उठाए हुए है, ठीक वैसे ही जैसे नदी एक पत्ते को उठाए बहाती हुई ले जाती है। पर पत्ता नदी से नहीं पूछता कि समुद्र कितनी दूर है। वह केवल बहता है। और शायद जीवन का सबसे बड़ा रहस्य यही है।

सूत्र- परिवर्तन को स्वीकार करें
जीवन को मुट्ठी में कैद करने की कोशिश ही सबसे बड़ा भय है। जो व्यक्ति नदी की तरह बहना सीख लेता है, परिवर्तन को स्वीकार कर लेता है और नियंत्रण छोड़ देता है, वही भीतर से मुक्त, शांत और सच में जीवित हो पाता है। अस्तित्व हमेशा उसी को सहारा देता है, जो कठोर नहीं, बल्कि जल की तरह सहज, विनम्र और प्रवाहमान बना रहता है।
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