हमारे धर्मग्रंथों और नीतिशास्त्रों में कहा गया है कि अपना हर क्षण ईश्वर की भक्ति और दूसरों की सेवा-सहायता में व्यतीत करने वाला व्यक्ति ही समाज में उच्च स्थान प्राप्त करता है। इसी से जुड़ा एक प्रसंग भद्रजित का है। एक दिन राजा बालीक ने किसी बात पर नाराज होकर अपने प्रधानमंत्री भद्रजित को पद से हटा दिया। उन्होंने क्रोध में कहा, अब तुम्हें अपनी औकात का पता चल जाएगा। भद्रजित शांति और शालीनता के साथ राजा का अभिवादन कर राजदरबार से चले गए।
भद्रजित धर्मनिष्ठ व्यक्ति थे। अपने नगर लौटकर वह अपना समय भगवान की आराधना तथा जनसेवा में लगाने लगे। कुछ ही समय में वह लोकप्रिय हो गए। लोग उनके सत्संग के लिए लालायित रहते थे। एक दिन राजा बालीक की इच्छा हुई कि भद्रजित की दयनीय हालत को आंखों से देखा जाए। वह वेश बदलकर नगर में पहुंचे। उन्होंने देखा कि भद्रजित अनेक भद्रपुरुषों से घिरे हुए उनकी समस्याओं का समाधान कर रहे हैं।
कुछ ही समय में राजा को भद्रजित की लोकप्रियता का अनुभव हो गया। उधर भद्रजित ने राजा को पहचान लिया और उनसे बोले, महाराज, यदि आप मुझे पद से नहीं हटाते, तो मुझे लोगों की सेवा तथा भगवान की भक्ति का सौभाग्य नहीं मिलता। यह सब प्रताप आपकी उस कृपा का ही है। मैं आजन्म आपके प्रति आभारी रहूंगा। राजा बालीक भद्रजित की विनम्रता देखकर हतप्रभ रह गए।