अयोध्या में राम मंदिर का मामला एक ऐसी फिल्म की तरह है, जिसको हम पहले बहुत बार देख चुके हैं। पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट ने राम मंदिर पर सुनवाई अगले साल तक टाल देने का निर्णय क्या सुनाया कि इस पर फिर किसी न किसी की राय सुनने को मिलने लग गई है। कांग्रेस के आला नेता कह रहे हैं कि जब भी चुनावों का मौसम आता है, तब भारतीय जनता पार्टी अयोध्या में मंदिर के निर्माण की चर्चा शुरू कर देती है। सब राजनीति है जी, राजनीति। लेकिन कांग्रेस ऐसी बात कहने वाली कौन होती है, जब 1989 में स्वयं राजीव गांधी ने रामराज्य का वादा करके अयोध्या से अपना चुनाव अभियान शुरू किया था? उनके सुपुत्र इन दिनों खुद को जनेऊधारी ब्राह्मण कहते फिरते हैं और हर दूसरे दिन किसी न किसी मंदिर में आरती की थाली उठाए हुए दिखते हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कम से कम अपने आप को गर्व से हिंदू हितों का रक्षक तो मानता है, सो उनसे राम मंदिर के निर्माण की बातें सुनकर किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। इन दिनों राम मंदिर का निर्माण शीघ्र आरंभ करने की खूब बातें हो रही हैं। बहुत से लोगों के बहुत बयान आने लग गए हैं, लेकिन ऐसे लोग बहुत कम हैं, जो इस विवाद के समाधान का ईमानदारी से प्रयास करते दिख रहे हैं। उमा भारती शायद उनमें से एक हैं। पिछले सप्ताह एक टीवी पत्रकार से उन्होंने कहा कि राम जन्मभूमि में मंदिर का निर्माण ही देश में सद्भाव और भाईचारा लाने का रास्ता है।
क्या ऐसा है? और अगर ऐसा है, तो इसके बारे में मुस्लिम राजनेता और मौलाना सोचने को तैयार क्यों नहीं हैं? आखिर में राम और बाबर के बीच चयन करना हो, तो कोई भी हिंदुस्तानी बाबर को नहीं चुनेगा, चाहे वह हिंदू हो या मुस्लिम। अल्लामा इकबाल ने राम को इमाम-ए-हिंद का खिताब दिया था। सो मुस्लिम राजनेताओं और मौलवियों के लिए यह स्वीकार करना इतना मुश्किल क्यों है कि राम मंदिर उस स्थान पर बनना चाहिए, जहां हिंदुओं की आस्था है, जहां राम लला पैदा हुए थे? इसका एक मुख्य कारण यह है कि आम मुसलमान के दिल में एक भय पैदा कर दिया गया है कि अयोध्या के राम मंदिर पर अगर उन्होंने सुलह कर ली, तो कल कृष्ण जन्मभूमि की बात उठने लगेगी और उसके बाद बात बनारस के उस विश्वनाथ मंदिर तक कैसे नहीं पहुंच जाएगी, जहां आज भी प्राचीन मंदिर की ईंटें दिखती हैं उस विशाल मस्जिद के नीचे, जो औरंगज़ेब ने यहां बनाई थी?
इस पुरानी समस्या का समाधान ढूंढना वैसे भी कठिन है और इसमें अब इतनी कड़वी राजनीति घुल गई है कि अब जय श्रीराम कहना ही मुश्किल हो गया है, उनकी जन्मभूमि पर मंदिर निर्मित करना तो दूर की बात। गालिब ने कभी कहा था, जहां हम हैं वहां शेख-ओ-बरहमन की आजमाइश है, लेकिन अब असली आजमाइश राजनेताओं के बीच है और इस परीक्षा में हमारी एक भी राजनीतिक पार्टी खरी नहीं उतरती है। सब अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं। ऐसा कहने के बाद यह भी कहना जरूरी है कि समाधान शीघ्र ढूंढना अनिवार्य हो गया है, क्योंकि इस समाधान से लाभ हिंदुओं को भी होगा और मुसलमानों को भी। जेहादी इस्लाम और कट्टरपंथी हिंदुत्व के इस दौर में देश का वातावरण इतने जहरीले विचारों से प्रदूषित हो गया है कि इस तरह के विवाद अब बहुत खतरनाक हो गए हैं। सो हमें वह राजनेता या धर्मगुरु ढूंढना होगा, जो राम मंदिर के निर्माण की कार सेवा के लिए हिंदुओं और मुसलमानों को इकट्ठा कर सके। क्या ऐसा कोई राजनेता या धर्मगुरु है?