जयललिता के निधन से तमिलनाडु की राजनीति में एक बड़ा शून्य पैदा हो गया है। जयललिता ने अपनी पार्टी अन्नाद्रमुक में नेतृत्व की दूसरी पंक्ति तैयार नहीं की। हालांकि पन्नीरसेल्वम को राज्य का नया मुख्यमंत्री बनाया गया है, लेकिन उनकी जगह को भरना आसान नहीं होगा। उनके निधन से उग्रवाद और आतंकवाद पर अंकुश, तमिलनाडु में आर्थिक और बुनियादी संरचनाओं के विकास जैसे कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर असर पड़ सकता है।
तमिलनाडु को लेकर उनके मन में एक सपना था, जिसे उन्होंने विजन 2023 के रूप में पेश किया था। साथ ही कावेरी जल विवाद के मुद्दे पर राज्य के हक को लेकर वह संघर्ष कर रही थीं। प्रधानमंत्री को लिखी उनकी आखिरी चिट्ठी कावेरी से ही संबंधित थी। इसके अलावा वह केंद्र सरकार से जीएसटी के मुद्दे पर भी लड़ रही थीं। उनमें सच को स्पष्टता से कहने का साहस था।
जयललिता ने राज्य को स्थिर नेतृत्व दिया। उन्होंने सख्ती से श्रीलंकाई चरमपंथी समूह लिट्टे को राज्य से बाहर खदेड़ दिया। वह गर्व से कहा करती थीं, तमिलनाडु एक शांतिपूर्ण राज्य है। कानून और व्यवस्था पर उनका जबर्दस्त नियंत्रण था, जिसके लिए मजबूत और दृढ़ इच्छाशक्ति वाले नेतृत्व की जरूरत होती है। जयललिता ने पूरे आत्मविश्वास के साथ शासन किया। उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खासियत थी गरीब समर्थक छवि। चाहे मुख्यमंत्री के रूप में हो या उससे पहले फिल्मों में, उन्होंने खुद को एक सरल महिला के तौर पर पेश किया। अम्मा कैंटीन, अम्मा इडली, अम्मा वडा, अम्मा डोसा उनकी प्रिय सामाजिक योजनाएं थीं। गरीबी से लड़ने में कोई भी उनका मुकाबला नहीं कर सकता। उनके व्यक्तित्व के कारण राजनीतिक क्षेत्र में बहुत कम लोग उनके कट्टर राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी थे। जयललिता के मुख्य विरोधी द्रमुक के करुणानिधि हैं। विधानसभा चुनाव में द्रमुक को भारी शिकस्त देकर जयललिता सत्ता में आईं।
जयललिता राजनीति में एकला चलो में विश्वास करती थीं। उनका कोई परिवार नहीं है। शशिकला के अलावा कोई भी उनके साथ नहीं रहता था। जयललिता शशिकला को अपनी बहन कहती थीं। जयललिता के व्यक्तित्व के कई रूप थे। वह न केवल सक्षम वक्ता थीं, बल्कि बेहतरीन अभिनेत्री भी रह चुकी थीं। उनके ऊपर फिल्माए गए सिने गीत आज भी तमिलों की जुबां पर हैं। महिला मतदाताओं पर जयललिता की मजबूत पकड़ थी। उनके राजनीतिक गुरु एमजीआर थे। वह एमजीआर ही थे, जिन्होंने बहुत कम समय में अन्नाद्रमुक की तरफ से जयललिता को 1984 में राज्यसभा के लिए मनोनीत किया। तबसे 1989 तक वह सांसद रहीं। राज्यसभा में वह शुद्ध हिंदी में बोलीं। सोनिया गांधी के साथ मशहूर चाय पार्टी के बाद उन्होंने 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार गिरा दी थी। उनका वक्तृत्व-कौशल राज्यसभा में दिए उनके भाषणों में प्रदर्शित हुआ था।
जयललिता ने एक बार इन पंक्तियों के लेखक को बताया था कि वह द्रमुक प्रमुख करुणानिधि और कांग्रेसी नेता पी. चिदंबरम द्वारा उनके खिलाफ दायर किए गए राजनीतिक मुकदमों को लेकर चिंतित हैं। अपना शुरुआती जीवन तो उन्होंने फिल्मों में बिताया, लेकिन बाद में मुख्यमंत्री बनने के बाद हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में आय से अधिक संपत्ति के मामले में उनके खिलाफ कई मामले दर्ज हुए।
तमिलनाडु में राजनीतिक स्थिरता बेहद जरूरी है, क्योंकि अभी मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल साढ़े चार साल बचा हुआ है। ऐसे में वहां राजनीतिक परिदृश्य तेजी से बदल सकता है, क्योंकि अन्नाद्रमुक में थेवर जाति का वर्चस्व है, हालांकि नाडार और गुंडूर जैसी गैर थेवर जातियों की संख्या भी अन्नाद्रमुक में कम नहीं है। वह तो जयललिता का कद ही इतना बड़ा था कि वह तमिलनाडु की सभी जातियों और समुदायों को एकजुट रखती थीं। लेकिन उनके निधन के बाद जिला एवं ग्राम पंचायत स्तर पर राजनीतिक दल जातिगत भावनाओं को हवा दे सकते हैं। पहले छह महीनों में राज्य का राजनीतिक परिदृश्य संकटपूर्ण हो सकता है, हालांकि विधानसभा में अन्नाद्रमुक को बहुमत हासिल है, इसलिए स्थिरता की उम्मीद की जा सकती है। लेकिन नहीं भूलना चाहिए कि करुणानिधि की द्रमुक विधानसभा में मुख्य विपक्षी पार्टी है, जिसकी विधानसभा में मजबूत उपस्थिति है। करुणानिधि के बड़े बेटे एम के अझागिरी के द्रमुक से अलग हो जाने के बावजूद द्रमुक कार्यकर्ता एकजुट हैं। सवाल है कि जयललिता के परिदृश्य से हट जाने का क्या द्रमुक को फायदा होगा। अब तक तमिलनाडु में दो पार्टियों का ही शासन रहा है, जिसमें अन्नाद्रमुक और द्रमुक को बारी-बारी से शासन का मौका मिला है। तो क्या अब यह परिपाटी खत्म हो जाएगी? पीएमके, डीएमडीके और एमडीएमके जैसी छोटी पार्टियां उतनी मजबूत नहीं हैं, क्योंकि वे जिला स्तरीय संगठन माने जाते हैं। क्या ऐसी संभावना बन सकती है कि जब अन्नाद्रमुक के कार्यकर्ता जिला स्तरीय पार्टियों के साथ नजदीकी बढ़ाने की कोशिश करंे, तो भाजपा या कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियां इसका फायदा उठाएं? कावेरी जल विवाद के मुद्दे पर भाजपा और कांग्रेस ने तमिलों की भावना के खिलाफ जैसा सख्त रुख अपनाया है, ऐसे में इसकी कोई संभावना नहीं दिखती कि राष्ट्रीय पार्टियां तमिलनाडु में जड़ जमा पाएंगी। कांग्रेस ने 1967 में राज्य की सत्ता खो दी, उसके बाद से राज्य की राजनीति पर अपना प्रभाव जमाने में वह विफल रही। तमिलनाडु कांग्रेस खेमों में बंटी है, यही हाल भाजपा का है। इसे उच्च जाति की पार्टी माना जाता है। वैसे नरेंद्र मोदी लहर के कारण भाजपा ने थोड़ी राह बनाई है। लेकिन राज्य में भाजपा और कांग्रेस का सत्ता में आना मुश्किल लगता है।
जयललिता के निधन से तमिलनाडु का राजनीतिक परिदृश्य अस्थिर हो गया है, जिसे पटरी पर आने में समय लगेगा। इसे खत्म होने में छह महीने से साल भर का समय लग सकता है, तब तक राजनीतिक शून्य बना रहेगा।