कर्नाटक के चुनावी दशहरे में राजनीति के दिग्गजों की रंग-बिरंगी सवारियां निकल रही हैं। भाजपा के लिए दक्षिण के इस महत्वपूर्ण राज्य में अपनी सत्ता बचाए रखने की अग्निपरीक्षा है, तो कांग्रेस कर्नाटक जीतकर इसे केंद्र में अपने खिलाफ उठ रहे ज्वार को थामने के अवसर में बदलना चाहती है।
इसी तरह पिछली बार 29 सीटों पर सिमट गए जनता दल (एस) के लिए यह फिर से सूबे की सियासत की कुंजी अपने हाथ में रखने की अग्निपरीक्षा है, तो येदियुरप्पा के लिए सूबे की सियासत में खुद का वजूद साबित करने की लड़ाई।
कांग्रेस ने बाजी जीतने के लिए स्थिर सरकार देने, विकास योजनाओं को पटरी पर लाने, भ्रष्टाचार खत्म करने, येदियुरप्पा से लेकर रेड्डी बंधुओं पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों और लोकायुक्त जांच के बाद उनकी गिरफ्तारी को मुद्दा बनाकर भाजपा को कठघरे में खड़ा किया है। जवाब में भाजपा ने केंद्र सरकार पर लगने वाले भ्रष्टाचार के आरोपों, 2जी से लेकर कोयला घोटाले, महंगाई, आतंकवाद, चीनी घुसपैठ और पाकिस्तान की हरकतों से निपटने में यूपीए सरकार की कमजोरी के जरिये अपनी सियासी जमीन बचाने की कोशिश की है।
लेकिन बंगलूरू शहर में सड़कों पर घूमते हुए जितने भी लोगों से बात हुई, सभी ने बदलाव की बात कही। प्रदेश भाजपा कार्यालय में बैठे स्थानीय नेता और कार्यकर्ता भी मानते हैं कि इस बार 2008 जैसे हालात नहीं हैं। इसके बावजूद नरेंद्र मोदी की बंगलूरू में हुई सफल जनसभा से उन्हें उम्मीद है। महाराष्ट्र से लगे बेलगाम समेत राज्य के मराठी भाषी लोगों को लुभाने के लिए कांग्रेस ने पृथ्वीराज चह्वाण को चुनाव प्रचार में झोंक दिया है।
राज्य की सबसे मजबूत लिंगायत बिरादरी को लेकर भाजपा और येदियुरप्पा के बीच जंग छिड़ी है। भाजपा का तर्क है कि चूंकि येदियुरप्पा की पार्टी को बहुमत मिलना असंभव है, इसलिए लिंगायत भाजपा के साथ रहेंगे। मौजूदा मुख्यमंत्री भी लिंगायत हैं। जबकि दूसरे बड़े समुदाय वोक्कालिगा को लेकर जद (एस) और कांग्रेस में खींचतान है।
एचडी देवगौड़ा को वोक्कालिगा समुदाय का सबसे बड़ा नेता माना जाता है, जबकि कांग्रेस एसएम कृष्णा को आगे कर रही है। नेता विपक्ष सिद्दारमैया कुर्बा समुदाय से आते हैं, लिहाजा कांग्रेस को पिछड़ों का वोट मिलने का भरोसा है। मुसलमान भी कई सीटों पर निर्णायक हैं, पर कुमारस्वामी के भाजपा के समर्थन से सरकार चलाने और नरेंद्र मोदी के चुनाव प्रचार में आने से मुस्लिम मतदाताओं का रुझान कांग्रेस के पक्ष में ज्यादा दिखाई देता है।
कड़े नियमों और जबर्दस्त निगरानी से चुनाव आयोग ने कर्नाटक चुनाव को पारदर्शी बनाने की पूरी कोशिश की है। मायावती जैसी कद्दावर नेता की भी दो बार तलाशी ली गई। पार्टियों के झंडे सिर्फ चुनाव कार्यालयों और उम्मीदवारों की गाड़ियों तक सिमट कर रह गए हैं।
ऐसे में प्रचार के हाईटेक तरीके सामने आ रहे हैं। ई-मेल और रिकॉर्डेड मोबाइल फोन कॉल के जरिये मतदाताओं से संपर्क किया जा रहा है। साइबर जमीन पर लड़े जा रहे इस प्रचार युद्ध में जनता दल (एस) ने खासी तेजी दिखाई है। भ्रष्टाचार, पर्यावरण, सुशासन, जैसे तमाम मुद्दों पर कुमारस्वामी ने लोगों से सीधा संवाद शुरू किया है।
साफ-सफाई, शांत मौसम और खूबसूरती के लिए मशहूर बंगलूरू इन दिनों जल संकट, गंदगी और अवैध निर्माण कार्यों से जूझ रहा है। स्थानीय निकायों के चुनाव में लोग इस मुद्दे पर भाजपा सरकार के खिलाफ अपना गुस्सा दिखा चुके हैं। कांग्रेस विधानसभा चुनाव में भी इसे मुद्दा बना रही है। देर रात महिलाओं की सुरक्षा भी एक बड़ा मुद्दा है।
कर्नाटक के चुनाव में राजनीतिक दल एक-दूसरे पर धनबल के जरिये वोटों की तिजारत का भी आरोप लगा रहे हैं। वोटों के कई स्वयंभू ठेकेदार हर पार्टी के उम्मीदवारों से संपर्क कर थोक वोटों का सौदा करने में लगे हैं। इन सबके बीच लोगों को मतदान के प्रति जागरूक करने का चुनाव आयोग के सहयोग से चलाया जा रहा अभियान काफी लोकप्रिय है। कनार्टक चुनाव का नतीजा चाहे जो हो, चुनावी लड़ाई अभी तक तो बहुत दिलचस्प दिख रही है।