ऐसा पहली बार है, जब एक यूरोपीय राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से लिए गए कर्ज का भुगतान न कर पाने की वजह से दीवालिया होने के कगार पर है।
ग्रीस खुद पर लदे कर्ज की 1.7 अरब डॉलर की एक किस्त का भुगतान नहीं कर सका। इससे नौ अरब डॉलर से ज्यादा के बेल आउट पैकेज के लिए चल रही वार्ता भी संकट में पड़ गई, जिसे लेकर ग्रीस के अधिकारी आईएमएफ के साथ वार्ता कर रहे थे, ताकि अगले दो वर्षों तक वेतन और पेंशन का भुगतान किया जा सके।
इस महत्वपूर्ण मदद पैकेज के मिलने की धूमिल संभावनाओं के बीच ग्रीस पर पूंजी पर नियंत्रण और एटीएम से निकाली जाने वाली राशि को सीमित करने का दबाव बन गया है। इससे ग्रीस के आम नागरिकों के साथ पूरी दुनिया के बाजारों में घबराहट का माहौल है। अगर ग्रीस वाकई यूरोजोन से बाहर निकल जाता है, तो इससे यूरोप और भारत जैसी दूसरी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के बीच पूंजीगत प्रवाह पर असर पड़ सकता है।
भारत सरकार मानती है कि भारतीय कंपनियों ने यूरोपीय बैंकों से जो कर्ज लिया है, उस पर ब्याज दरों में कुछ समय के लिए बढ़ोतरी हो सकती है। इसके अलावा पूंजीगत प्रवाह में बाधा पहुंचने से विनिमय दर में भी अस्थिरता आने की आशंका है।
वॉल स्ट्रीट के विश्लेषकों को लगता है कि ग्रीस के यूरो से बाहर निकलने से पड़ने वाले प्रभाव को वैश्विक बाजार नियंत्रित कर लेंगे, लेकिन ऐसे घटनाक्रमों का कुछ असर तो पड़ता ही है। वैसे फिलहाल यह भरोसा कायम है कि इससे बहुत ज्यादा नुकसान नहीं होगा, क्योंकि ग्रीस यूरोपीय अर्थव्यवस्था में महज दो फीसदी का हिस्सेदार है। दरअसल, मामला केवल ग्रीस का नहीं है, जहां सरकारी कर्ज 2009 में जीडीपी के 90 फीसदी से बढ़कर 2015 में 174 फीसदी पर पहुंच गया। चिंता पुर्तगाल, आयरलैंड और स्पेन जैसे कुछ और देशों को लेकर भी है, जहां कर्ज का यह प्रतिशत जीडीपी के 120 से 135 फीसदी के बीच पहुंचा हुआ है।
जीडीपी के अनुपात में पूरे यूरोजोन का औसत कर्ज अपने आपमें सौ फीसदी है। इसकी तुलना में भारत पर कर्ज जीडीपी का 65 फीसदी है, जबकि चीन का इससे कम है।
यूरोजोन में लंबे समय से चली आ रही इन कमजोरियों को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। कोई नहीं जानता कि ग्रीस के यूरोजोन से बाहर होने से दूसरे यूरोपीय देशों की हालत कैसे सुधर पाएगी, जिन पर कर्ज का बोझ पिछले छह वर्षों में 70 से 80 फीसदी तक बढ़ चुका है; और जहां विकास और रोजगार के मोर्चों पर कुछ बेहतर होने के कोई संकेत भी नहीं दिख रहे हैं। पुर्तगाल और आयरलैंड मजदूरों के लिए पैकेज में कटौती और छोटे व्यापारियों की सामूहिक सौदेबाजी की क्षमता में कमी लाने से संबंधित आईएमएफ की कठोर शर्तों को पहले ही मंजूरी दे चुके हैं।
श्रम बाजार में 'हायर ऐंड फायर' की नीति ही आईएमएफ और दूसरे यूरोपीय कर्जदाताओं से कर्ज पाने की शर्त बनी हुई है। ग्रीस इस शर्त को स्वीकार नहीं करना चाहता। जाहिर है, इसका खामियाजा अभिजात वर्ग को नहीं, बल्कि वेतनभोगी वर्ग को भुगतना पड़ेगा। ग्रीस से भी इन सख्त शर्तों का पालन करने को कहा जा रहा है। आईएमएफ और दूसरे यूरोपीय कर्जदाता राष्ट्रों की ऐसी अपमानजनक शर्तों को नामंजूर करने के वायदे के साथ 2014 में 'सिरिजा' पार्टी सत्ता में आई थी। गौरतलब है कि ग्रीस से अपने पेंशन भुगतानों में कटौती करने और श्रम सुधारों को लागू करने के लिए भी कहा जा रहा है, जिससे मजदूरों की सौदेबाजी की ताकत में कमी आएगी, जबकि कॉरपोरेट मुनाफा कमाएगा।
चूंकि ग्रीस के प्रधानमंत्री सिप्रास को यह अपमान स्वीकार नहीं है, इसलिए उन्होंने जनमत संग्रह का रास्ता अपनाया। आईएमएफ को भुगतान करने की अंतिम तारीख 30 जून से पहले ग्रीस ने यूरोपीय कर्जदाताओं के सामने प्रस्ताव रखा था। इसमें कहा गया कि अगर ग्रीस को दो वर्ष की मदद का पैकेज उपलब्ध कराया जाएगा, तो वह जनमत संग्रह रोक देगा। इस पर जर्मनी के नेतृत्व में कर्जदाता राष्ट्रों ने कोई भी कदम उठाने से पहले जनमत संग्रह के नतीजे को देखने का फैसला किया।
तो अब सबकी निगाहें पांच जुलाई को होने वाले जनमत संग्रह पर है। ग्रीस के मतदाता असमंजस में हैं। यहां के ज्यादातर लोग यूरोजोन में रहना चाहते हैं, मगर वेतनभोगी वर्ग पर असर डालने वाली ऐसी अपमाजनक शर्ते उन्हें मंजूर नहीं हैं। नागरिकों में इस बात के लिए भी नाराजगी है कि वे एटीएम से एक दिन में साठ यूरो से ज्यादा नहीं निकाल सकते।
अगर ग्रीस को यूरोजोन से बाहर निकलने पर बाध्य किया जाता है, तो इससे यूरोजोन से होने वाले वित्तीय प्रवाह पर कुछ समय के लिए नकारात्मक असर तो पड़ेगा। ग्रीस ने कर्जदाता राष्ट्रों, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और यूरोपीय सेंट्रल बैंक से 271 अरब डॉलर का कर्ज लिया है। विशेषज्ञों के मुताबिक ग्रीस के बहुत सारे बॉन्ड्स आईएमएफ, यूरोपीय सेंट्रल बैंक या दूसरी यूरो सरकारों के कब्जे में हैं। केवल तकरीबन 40 अरब डॉलर के बॉन्ड्स निजी तौर पर ग्रीस के पास हैं। यूरोजोन से बाहर निकलने पर भी कम से कम ये बॉन्ड्स ग्रीस के पास ही रहेंगे।
मगर इस मुद्दे पर कोई बात नहीं कर रहा है कि जर्मनी, स्पेन, फ्रांस और इटली जैसे देशों में कुछ बड़े निजी यूरोपीय बैंक ग्रीस, स्पेन, पुर्तगाल और आयरलैंड जैसी संवेदनशील अर्थव्यवस्थाओं के सरकारी बॉन्ड्स पर कब्जा जारी रखे हुए हैं। यूरोजोन से ग्रीस के बाहर निकलने से इन बॉन्ड्स को लेकर आशंकाएं बढ़ जाएंगी।
ग्रीस संकट का भारत पर भी लघु और मध्यम अवधि का असर पड़ने की आशंका है। दरअसल, भारतीय कंपनियों को डॉलर के रूप में मिलने वाले कर्ज का 40 फीसदी से ज्यादा हिस्सा उन यूरोपीय बैंकों से मिलता है, जिनका वित्तीय कारोबार में प्रभुत्व है। लिहाजा भारत पर ऐसे समय बोझ बढ़ सकता है, जब वह अपनी आधारभूत संरचना के लिए अरबों डॉलर का फंड जुटाने की कोशिश कर रहा है।