बीरभूम में एक बीस साल की लड़की के साथ जिस तरह का व्यवहार पंचायत के मुखिया के आदेश पर किया गया, वह कितना अशोभनीय और अकल्पनीय है। स्त्रीवादी सोच अक्सर कहती है कि उच्च पदों पर बैठी औरतें, औरतों की तकदीर बदल सकती हैं। बंगाल में महिला मुख्यमंत्री ही हैं। लेकिन बंगाल में बलात्कार की ऐसी कई घटनाएं हुई हैं, जिस पर वहां की मुख्यमंत्री ने चुप्पी साध ली। दरअसल महिला-पुरुष से ज्यादा लोकतंत्र का वह गणित है, जिसमें हर वोट का हिसाब लगाना पड़ता है। और इसी हिसाब के कारण कोई नेता चुप रहता है या मुखर होता है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री का व्यवहार भी यही बताता है।
बीरभूम की घटना पर वहां की एक मंत्री ने कहा कि सरकार की तरफ से इस घटना के संबंध में जो कुछ किया जा सकता था, वह किया गया। यह कितने अफसोस की बात है कि जिस पंचायती राज को गांधी जी ‘राम राज्य’ कहते थे, गरीबों की हर समस्या का अचूक नुस्खा मानते थे, वह दरिंदा राज साबित हो रहा है। क्या चर्चित समाजसेवी अन्ना हजारे जी सुन रहे हैं, क्योंकि वह भी पंचायतों को देवता तुल्य मानते हैं।
खबर है कि लड़की के परिवार वाले बेहद डरे हुए हैं। वे पुलिस में शिकायत भी नहीं कराना चाहते। लड़की को डर है कि अगर वह गांव वापस गई, तो उसे गांव वालों का बहिष्कार झेलना पड़ेगा। लड़की के भाई का भी कहना है कि मुखिया उनका पड़ोसी है। उसने जो फैसला दिया उसकी उम्मीद उन्हें कतई नहीं थी, क्योंकि इससे पहले गांव में कभी किसी को ऐसी सजा नहीं दी गई। अगर वे गांव वापस गए, तो उन्हें गांववालों का गुस्सा झेलना पड़ सकता है।
लड़की को सजा इसलिए मिली कि वह अपने समुदाय के बाहर के लड़के से प्यार कर बैठी, इसलिए सजा के काबिल मानी गई। लड़की और प्यार, इससे बड़ा अपराध क्या कोई हो सकता है! इसके उलट एक घटना बिहार में हुई, जहां एक पिता ने अपने लड़के पर इसलिए मुकदमा कर दिया कि उसने अंतर्जातीय विवाह किया। लड़के के पिता ने कहा कि उसके लड़के को कोई हक नहीं कि वह परिवार की परंपराओं को तोड़ते हुए दूसरी जाति की लड़की से विवाह करे और जेनेटिक डिसऑर्डर पैदा करे। लड़के के पिता ने यह शर्त भी लगाई है कि यदि लड़का उसका सरनेम इस्तेमाल करेगा, तो उसे दंडस्वरूप दस हजार रुपये महीना पिता को देने होंगे। पिता ने अपने नाम को बदनाम करने के लिए एक करोड़ रुपये का हर्जाना भी मांगा है। हां, अगर लड़का लड़की को तलाक दे दे, तो पिता उसे स्वीकार कर लेगा। यह पिता जी पेशे से वकील हैं। लेखक और कवि भी हैं।
एक ओर जाति की बेड़ियों का यह हाल है, तो दूसरी तरफ बिहार सरकार अंतर्जातीय विवाह करने पर लड़कियों को पचास हजार रुपये का इनाम देने की घोषणा कर चुकी है। अब बच्चे इनाम लें या अपनी जान की खैर मनाएं। हमारे एक हाथ में बेहतरीन मोबाइल है, बड़ी कार है, ब्रांडेड कपड़े हैं, मगर दूसरी ओर का हाथ गले में जाति की माला पहने हुए है। ऐसा लगता है कि जिस जाति के डिस्कोर्स को हम तोड़ने चले थे, वह तीन-चार गुना गति से बढ़ रहा है।
यहां कहने का अर्थ यह है कि चलो मान लिया कि अपनी पसंद के लड़के को चुनने में लड़कियों को ज्यादा यातना झेलनी पड़ती है, जान गंवा देनी पड़ती है, लांछन तोहफे में मिलते हैं, सामाजिक बहिष्कार झेलना पड़ता है, मगर लड़के भी माता-पिता की सामंतवादी सोच और अधिकार की भावना से बच नहीं पाते। हरियाणा के गांवों के बारे में तो हम अक्सर पढ़ते ही हैं कि वहां लड़के-लड़कियों की गर्दन अपने ही परिजन उड़ा देते हैं। और इस बात को काफी गर्वपूर्वक कहते हैं कि इस तरह की औलाद होने से तो बे-औलाद ही होना अच्छा है। साथ ही यह कि जो बच्चा गांव की रीति-रिवाज, रिवायत को तोड़ेगा, अगर उसकी जान चली भी जाए, तो कोई दुख नहीं।
इक्कीसवीं सदी के इन वर्षों में ऐसी घटनाएं पश्चिमी देशों को चकित करती हों, मगर वे हमारे समाज में व्याप्त जातिवाद के झूठे अहंकार को ही बताती हैं। हम भले ही गाते रहें कि जमाना नया है। इसमें पुरानी सोच की कोई जगह नहीं।