बीते 25 मई को माओवादियों ने बस्तर में एक बड़े हमले को अंजाम देते हुए लोकतांत्रिक व्यवस्था को चुनौती दी। देश की सरकार और राजनेता सभी चिंतित हुए। राष्ट्रीय न्यूज चैनलों में करीब एक हफ्ते तक इस हमले का असर दिखा। मगर 13 जून को बिहार में इंटरसिटी ट्रेन पर हुए नक्सली हमले से एक बार फिर स्पष्ट हो गया है कि न तो पिछले हमलों से सबक लिए जा रहे हैं और न ही नक्सल प्रभावित राज्यों में तालमेल की कमी को दूर किया जा रहा है।
माओवादियों ने पिछले महीने छत्तीसगढ़ में किए गए हमले के जरिये जो दबाव बनाया है, वह चिंताजनक है। नक्सल प्रभावित प्रदेशों के साथ केंद्र सरकार केवल चिंता जाहिर कर रही है, मगर दिल्ली में हो रही बैठकों का परिणाम नहीं निकल रहा है। परिवर्तन यात्रा में निकली छत्तीसगढ़ कांग्रेस पार्टी पर हुए हमले के बाद केंद्र सरकार ने सर्वदलीय बैठक बुलाई। इसमें प्रधानमंत्री और गृह मंत्री ने नक्सलवाद को लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा माना। पर कार्रवाई क्या करेंगे, इस पर कोई खुला विचार सामने लाने से कतराते नजर आए।
यह भी उलझता हुआ ही दिखा कि मसला केंद्र निपटाए या राज्यों के मत्थे मढ़े। इस बैठक में नक्सल प्रभावित राज्यों के बीच समन्वय का मसला भी उठा। यह स्पष्ट किया गया कि अब आपसी तालमेल पर जोर दिया जाएगा। बावजूद इसके नक्सलियों ने बिहार में इंटरसिटी ट्रेन पर हमला किया, जिससे साफ है कि नक्सलियों से निपटने की जमीनी स्तर पर अब भी कोई तैयारी नहीं है।
हमले के बाद गृह राज्य मंत्री आरपीएन सिंह का बयान तो सरकार की नाकामी को ही दर्शा रहा है। वे कह रहे हैं कि यह हमला छत्तीसगढ़ में हुए हमले के बाद फोर्स के दबाव का परिणाम है। आंध्र प्रदेश में नक्सलियों पर जब दबाव बनाया गया था, तो उन्होंने छत्तीसगढ़ और ओडिशा जैसे पड़ोसी राज्यों में पैर पसार लिए। यदि नक्सल प्रभावित राज्यों के बीच तालमेल होता, तो यह स्थिति आती ही नहीं।
जीरम घाट पर हुए नक्सली हमले के बाद पहली बार देश के राजनेताओं को यह लगा कि माओवादी देश की लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गए हैं। छत्तीसगढ़ सरकार ने करीब पांच बरस पहले नक्सल मुद्दे पर छत्तीसगढ़ विधानसभा में बंद कमरे में बैठक करवा चुकी है। इस बैठक में सभी 90 विधायकों ने अपनी बातें रखी थीं। पर इस बैठक के नतीजे कभी सामने नहीं आए और न ही यह पता चला कि इस बैठक के आधार पर सरकार ने क्या कदम उठाए।
एक तथ्य यह भी है कि बीते पांच वर्षों में छत्तीसगढ़ में सुरक्षा बलों की बटालियन 20 से बढ़कर 30 हो चुकी है। दरभा हमले के बाद दो और बटालियन देने की घोषणा केंद्रीय गृह मंत्री ने की है। यानी अब 32 हजार जवान माओवादियों से निपटने के लिए प्रदेश के पास उपलब्ध होंगे। इन जवानों का पहले किस तरह से उपयोग किया गया और अब क्या उपयोग होगा, यह भी कोई नहीं जानता।
छत्तीसगढ़ बनने के बाद यह माना गया था कि प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर यह प्रदेश तेजी से विकास करेगा। मगर आज भी प्रदेश के बड़े ग्रामीण हिस्से में पीने के पानी, बिजली और स्वास्थ्य की समस्या आम है। इस नए प्रदेश में जिलों की संख्या 18 से 28 हो चुकी है। पहले आठ जिले नक्सल प्रभावित थे, अब 18 हो गए हैं।
हमले दर हमले, बारुदी विस्फोट, नक्सलियों की एंबुश, माओवादियों का सीधा हमला, रात को धमाके, दिन में फायरिंग, बाजार में फायरिंग, थाने में फायरिंग, दिन दहाड़े हत्या... और न जाने कितने तरीके। सभी का अंत मौत के आंकड़ों को बढ़ाता दिखता है। नक्सलियों ने हर बार अपने हमलों से सरकार के सामने नई चुनौती ही पेश की है। वहीं चाहे केंद्र हो या राज्य सरकार, हर हमले के बाद उनकी ओर से एक ही जवाब सुन-सुनकर लोग उकता गए हैं।
यह समझना जरूरी है कि थोथे भाषणों और बयानबाजी से नक्सलवाद का खात्मा नहीं होने वाला। सच्चाई तो यह है कि जहां नक्सलियों का ज्यादा दबाव बढ़ा है, वहां विकास के रास्ते बंद होते दिख रहे हैं। छत्तीसगढ़ में हमले के बाद एनएच 30 के जीरम घाट में नक्सली माओवाद जिंदाबाद के नारे लगाकर जंगल में फिर लौट गए हैं, लेकिन उनकी दहशत अब भी कायम है।