माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रूंधे मोय
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रूंधूंगी तोय
कबीर की ये पंक्तियां हमें विनम्रता का बेहद मूल्यवान पाठ पढ़ाती हैं कि कभी किसी को घमंड नहीं करना चाहिए, क्योंकि कोई नहीं जानता कि हालात कब बदल जाएंगे। अफसोस की बात है कि कम ही लोग इन पंक्तियों को अपनी जिंदगी में उतार पाते हैं, खासकर, वे लोग जिन्होंने राजनीतिक या आर्थिक मोर्चे पर कुछ मुकाम हासिल किया है। आज के राजनीतिक परिदृश्य में ये पंक्तियां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके समर्थकों के लिए सबसे सख्त संदेश हैं। पिछले वर्ष लोकसभा चुनाव में सशक्त प्रदर्शन के बावजूद कोई नहीं जानता कि हवा का रुख कब बदल जाए। कुछ मायनों में यही गलती वाजपेयी सरकार ने की थी। इसे क्रिकेट की भाषा में समझें, तो वाजपेयी सरकार तब स्टंप आउट हो गई, जब बल्लेबाज फ्रंटफुट पर आकर एक शानदार ड्राइव खेलने की कोशिश कर रहा था। मोदी सरकार के पहले वर्ष के खत्म होने के साथ ही यह तो साफ हो गया है कि नरेंद्र मोदी ने ठीक से गार्ड नहीं लिया, जिससे विकेट उखड़ने का खतरा रहता है। इसके बावजूद चुनाव से पहले वाले अंदाज में उन्होंने ताबड़तोड़ शॉट खेलना जारी रखा। उनकी यह रणनीति पिछले वर्ष जहां उनके चुनावी अभियान में कामयाब रही थी, वहीं अब कुछ बिखरती-सी दिख रही है।
आप सभी ने टेलीविजन चैनलों पर अपनी उपलब्धियों का बखान करते मंत्रियों की बातें सुनी होंगी। सरकार के लिए मीडिया के जरिये यह आत्मप्रचार इसलिए हुआ, क्योंकि पिछले पूरे वर्ष पत्रकारों की अनदेखी करने के बाद सरकार को अपना रवैया थोड़ा नरम करने की जरूरत महसूस हुई। पूछे गए सवालों के जो जवाब और प्रतिक्रियाएं मंत्रियों से मिलीं, उनसे दो बातें साफ तौर पर सामने आईं। पहली, धारणा की जो लड़ाई थी, उसमें कुछ हद तक सरकार को हार का सामना करना पड़ा है, क्योंकि वह अपनी उपलब्धियों को ठीक ढंग से पेश नहीं कर पाई। दूसरी बात जो सामने आई, वह यह है कि चूंकि सरकार को अभी एक साल ही हुआ है, इसलिए उसके कामकाज का सटीक आकलन उतना मुमकिन नहीं है। बार-बार यही दोनों बातें दोहराई गईं, जिनसे पता चलता है कि मोदी सरकार कहीं न कहीं अपने रास्ते से भटक गई है। यह इसलिए भी सच है, क्योंकि ये बातें उस सरकार के मंत्रियों के जरिये सामने आ रही हैं, जिसके अगुआ खुद प्रधानमंत्री हैं, और जो अपनी बात रखने के मामले में बेहद पारंगत माने जाते हैं।
उम्मीदों पर खरे न उतरने के पीछे सरकार के अभी सिर्फ एक वर्ष होने की जो दुहाई दी जा रही है, उसके बारे में यही कहा जा सकता है कि मोदी ने चुनावी अभियान के दौरान जो वायदे किए थे, उनसे लोगों की उम्मीदें असाधारण स्तर तक बढ़ चुकी हैं। उस वक्त मोदी और उनके समर्थक कुछ ऐसा प्रचार कर रहे थे, गोया मोदी के हाथों में कोई जादुई छड़ी हो। आसमान छूते इन वायदों का रूपक बना, 'गुजरात'। चूंकि ऐसा कुछ हो नहीं पाया, ऐसे में, व्यापारी से लेकर दिहाड़ी मजदूर तक समाज के तमाम तबकों में एक निष्क्रियता छाने लगी है।
मगर अपनी बात लोगों तक पहुंचाने की नरेंद्र मोदी की संवाद की रणनीति क्यों नाकामयाब हो गई? प्रचार के सारे हथकंडे अपना लिए जाने के बावजूद अगर ऐसा हुआ, तो यह उनके लिए ज्यादा चिंताजनक है ही, इससे काफी बढ़ा-चढ़ाकर हुए हाई-टेक प्रचार की उनकी रणनीति की प्रासंगिकता पर भी सवाल पैदा होता है। दरअसल, भारत जैसे देश में आज भी ज्यादातर संचार आपसी बातचीत के जरिये ही होता है। यह जरूरी था कि सरकार की कामयाबी की कहानियों पर चर्चाएं टैबलेट और कंप्यूटरों के बजाय हर सुबह गली-नुक्कड़ों के चाय स्टॉलों और पानवालों के पास जुटे लोगों के बीच तक पहुंचतीं। अपनी बात को समाज में नीचे तक पहुंचाने के लिए जमीनी स्तर के उत्साही कार्यकर्ताओं की जरूरत होती है। मगर, सरकार की अति केंद्रीकरण की शैली ने पार्टी को अपने कैडर से दूर कर दिया। पार्टी के साधारण कार्यकर्ता के उत्साह को बनाए रखने के लिए जरूरी है कि सरकार में उसकी भूमिका तय की जाए। मगर जब मंत्री ही बेरोजगार दिख रहे हों, तो अदने-से कार्यकर्ता के उत्साह की फिक्र किसे होगी?
अपनी विदेश यात्राओं पर मोदी ने मीडिया टीम को ले जाना बंद कर दिया है। अतीत में इन यात्राओं से मीडिया को न सिर्फ प्रधानमंत्री के कार्यों को, बल्कि सरकार के कामकाज और प्रधानमंत्री के साथ गए उद्योगपतियों की कार्यशैली को समझने का भी मौका मिलता था। पूरे साल मोदी की विभिन्न यात्राओं में कुछ कॉरपोरेट शख्सियतें उनके साथ रहीं। इनमें से कुछ ने तो प्रधानमंत्री के साथ ही होटल भी साझा किया। जब मोदी मुख्यमंत्री थे, तब अपनी विदेश यात्राओं में वह व्यापारियों से घिरे रहते थे। इनमें से कइयों की प्रमुख परियोजनाओं को वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा आयोजित निजी बैठकों में मोदी महज बोलकर मंजूरी देते थे। हालांकि अब ऐसा होने की उम्मीद नहीं की जा सकती, मगर मीडिया पर रोक लगाने से संदेह पैदा होना तो लाजिमी है।
मोदी सरकार अच्छे दिनों के वायदे के साथ आई थी, मगर अब कहा जा रहा है कि अच्छे दिन बेशक अभी नहीं आए हैं, मगर इसकी प्रक्रिया शुरू हो गई है। अब मैं यह पाठकों पर छोड़ता हूं कि जो सरकार एक वर्ष के भीतर अपने वायदे से पीछे हटती दिख रही है, उस पर कितना भरोसा किया जा सकता है। मोदी भूल रहे हैं कि इतिहास में सभी कामयाब सरकारों ने अपने कार्यकाल के पहले वर्ष में ही क्रांतिकारी बदलाव किए थे। मोदी की दूसरी भूल उनकी यह सोच है कि सारे बदलाव वह अकेले दम पर ला सकते हैं। उनका एक टीम लीडर बनना अभी बाकी है।
-वरिष्ठ पत्रकार, और नरेंद्र मोदी-द मैन, द टाइम्स के लेखक