जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला कश्मीर को लेकर केंद्र के रवैये से दुखी हैं। उन्होंने हाल में कहा कि केंद्र की तरफ से कश्मीर मसले के राजनीतिक पहलुओं को संबोधित करने की कोई कोशिश नहीं दिखाई दे रही है। लगता है कि केंद्र ने मान लिया है कि कश्मीर में अब कोई मसला नहीं है। वर्ष 2008 और 2010 में अलग-अलग मुद्दों और मौकों पर कुछ समय के लिए भड़के तूफानी जनाक्रोश को छोड़ दें, तो बीते कुछ वर्षों से कश्मीर में अपेक्षाकृत शांति रही है। पर इसका राजनीतिक सुदृढ़ीकरण नहीं किया जा सका। राजनीतिक नेतृत्व की यह सबसे बड़ी विफलता है।
संभव है, उमर ने हताशा में केंद्र से नाराजगी जताई हो। पर उनकी नाराजगी को किस रूप में लिया जाए? क्या यह सिर्फ कश्मीरी अवाम को लुभाने के लिए है? कश्मीर में नवंबर, 2014 से पहले विधानसभा के चुनाव होने हैं। ऐसे में उमर सारा कुसूर केंद्र के मत्थे क्यों न मढ़ें! पर उन्हें नहीं भूलना चाहिए कि वह ऐसे मुख्यमंत्री हैं, जिनकी पार्टी केंद्र की सरकार में हिस्सेदार है। उनके पिता फारूक अब्दुल्ला स्वयं एक वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री हैं। ऐसे में कश्मीर मोर्चे पर केंद्र की विफलताओं में क्या उमर या फारूक अब्दुल्ला अपनी हिस्सेदारी या जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ सकते हैं? पर यूपीए के बारे में यह बात पूरी तरह सच है कि उसने अपने नौ वर्षों के कार्यकाल में कश्मीर मसले के राजनीतिक समाधान के लिए ठोस पहल करने के बजाय परिस्थितियों के स्वतः अनुकूल होते जाने का नियतिवादी रवैया अपनाया।
जहां तक कश्मीर मसले के राजनीतिक समाधान के लिए अपेक्षित समझदारी का सवाल है, वह एनडीए के मुकाबले यूपीए के मौजूदा नेतृत्व के पास ज्यादा है। 2004 में सत्ता में आने के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के साथ अपनी हवाना मुलाकात में जैसी कूटनीतिक शुरुआत की, उससे कश्मीर मसले पर नई पहल के संकेत मिले थे, पर बात आई-गई हो गई।
कश्मीर मसले पर ठोस और सार्थक पहल के लिए जरूरी है कि समस्या के बुनियादी स्वरूप को समझा जाए। यह बात भारत, पाकिस्तान और कश्मीरी अलगाववादी, अच्छी तरह समझते हैं कि 66 साल पुरानी यह समस्या दो स्तरीय है। एक तो कश्मीर के अंदर शासन से संबंधित है और दूसरी, दोनों तरफ के सरहदी-विवाद से जुड़ी है। कश्मीर का एक बड़ा हिस्सा आज भी पाकिस्तान के पास है, जिसका सदर मुकाम मुजफ्फराबाद है। कश्मीर में आतंकी और अलगाववादी गतिविधियों के संचालन के लिए इस इलाके में भी इंफ्रास्ट्रक्चर और माड्यूल्स खड़े किए गए हैं।
यह बात सही है कि उमर अब्दुल्ला ने अपने पिता के मुकाबले शासन से जुड़े मसलों पर ज्यादा गंभीरता दिखाई है। उन्हें राज्यपाल एन एन वोहरा के रूप में एक समझदार मार्गदर्शक भी मिला है, जो स्वयं कश्मीर समस्या की तमाम परतों को अच्छी तरह से समझता है। पर कई बड़े मसले तो केंद्र द्वारा संबोधित होने हैं। बीते नौ वर्षों के दौरान यूपीए नेतृत्व ने समस्या के अध्ययन और समाधान की दिशा सुझाने के लिए दो पहल की। यूपीए-1 कार्यकाल में कश्मीर पर पांच कार्यसमूह बनाए गए थे, जबकि यूपीए-2 में दिलीप पडगांवकर की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय वार्ताकार समिति बनाई गई थी।
वस्तुतः दिलीप कमेटी का गठन घाटी में भड़के राजनीतिक जनाक्रोश को ठंडा करने के मकसद से किया गया था। इन कार्यसमूहों और कमेटी की रपटें नॉर्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक स्थित सरकारी आलमारियों में बंद पड़ी हैं। इससे पहले वर्ष 2000 के जून में जम्मू कश्मीर विधानसभा ने स्वायत्तता पर एक प्रस्ताव पारित करके केंद्र के विचारार्थ भेजा था। तत्कालीन एनडीए सरकार ने उसे देखने से भी इनकार कर दिया। उसके कुछ ही समय बाद उमर विदेश राज्यमंत्री बन गए। जम्मू कश्मीर में उनके पिता मुख्यमंत्री थे। पर इन दोनों ने एनडीए नेतृत्व पर दबाव बनाने के बजाय कुर्सी से चिपके रहना श्रेयस्कर समझा। उसी इतिहास की अब पुनरावृत्ति हो रही है। बस चरित्र और कुर्सियां बदली हैं। उमर श्रीनगर के सूबेदार हैं और फारूक साहब केंद्र के वजीर हैं।
पडगांवकर कमेटी (अक्तूबर, 2010) हो या इससे पहले मो. हामिद अंसारी की अध्यक्षता वाला कार्यसमूह (मई, 2006), दोनों की रिपोर्ट में कश्मीर के अंदर विश्वास-बहाली, शांति-सद्भाव कायम करने और बेहतर माहौल बनाने के कई ठोस और रचनात्मक सुझाव दर्ज हैं, जिन्हें समय रहते क्रियान्वित किया जाता, तो आज कश्मीरी समाज और सियासत की तस्वीर कुछ और होती। मसलन, सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (एएफएसपीए) जैसे प्रावधान को लेकर न्यायमूर्ति जीवन रेड्डी आयोग से लेकर अब तक गठित सभी विशेषज्ञ समितियों ने सुझाव दिया कि इसे या तो पूरी तरह वापस लिया जाए या समीक्षा करके इसके निरंकुश प्रावधानों में जरूरी संशोधन किए जाएं।
पर सरकार इस मुद्दे पर कभी ‘हां’ तो कभी ‘न’ करती है। सूबे के आर्थिक विकास, समाज और राजनीति के लोकतंत्रीकरण, रोजगार सृजन और भ्रष्टाचार उन्मूलन की दिशा में बड़े कदम की जरूरत से कौन इनकार करेगा! जहां तक सरहद-पार से जुड़ी समस्या का सवाल है, उसके समाधान के लिए अब और समय नहीं गंवाया जाना चाहिए। अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद पाकिस्तान की तरफ से कश्मीर में और खतरनाक घुसपैठ के खतरे मंडरा रहे हैं। ऐसे में पाकिस्तान की नई सरकार से संवाद की कोशिशें तेज की जानी चाहिए। तेजी से बदलती वैश्विक परिस्थितियों में सृजनात्मक हस्तक्षेप की सोच विकसित करनी होगी। पाकिस्तान पर सकारात्मक सोच के लिए दबाव बनाया जाना आज की बहुत बड़ी जरूरत है।