आप तक यह लेख आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर पहुंचा है। इस अवसर पर महिला आंदोलनों से जुड़े लोग, दुनिया भर की महिलाओं और उनके संघर्षों को याद करते हैं। पर यह सच है कि महिलाओं का एक बड़ा उपेक्षित हिस्सा है, जिन्हें हम उतना याद नहीं करते, जितना करना चाहिए-जैसे, एकल महिलाएं, परित्यक्ता, कुंवारी, तलाकशुदा और विधवा महिलाएं। ये वे महिलाएं हैं, जिन्हें समाज का बड़ा हिस्सा तिरस्कार और बहिष्कार का शिकार बनाता है।
पिछले एक महीने से सीमा की सुरक्षा करने वाले जवानों और अधिकारियों की विधवाएं हमें चारों तरफ से घेरे हुए हैं और हमसे हमदर्दी नहीं, संवेदनशीलता की मांग कर रही हैं। इन विधवाओं के सवालों को जवाब मिलना चाहिए, उनकी चिंताओं को समझा जाना जरूरी है।
सीआरपीएफ के हमले में शहीद हुए कर्नाटक के जवान एच गुरु की शवयात्रा में हजारों लोगों ने हिस्सा लिया और नारे लगाए। उनकी विधवा कलावती को मुख्यमंत्री ने 25 लाख रुपये देने का वायदा किया; इन्फोसिस ने दस लाख देने की घोषणा की; एक फिल्म नायिका ने आधा एकड़ जमीन उसके नाम करने को कहा। इस बीच खबर आई कि कलावती पर ससुराल वाले अपने देवर से शादी करने का दबाव बना रहे हैं, ताकि जो धन मिल रहा है, वह परिवार में रहे। पर कलावती और उसकी सास ने इसका खंडन किया।
पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले के बबलू सांतरा की विधवा मीता इतिहास की शिक्षिका है। जब उससे पूछा गया कि क्या वह अपने पति की मौत का बदला चाहती है, तो उसने जवाब दिया कि युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं है। उसका मानना है कि अगर सरकार सावधानी बरतती, तो यह हादसा नहीं होता। उसके शब्द बड़े तीखे हैं : ‘केंद्र सरकार हमारे जवानों की सुरक्षा के बारे में बिलकुल चिंतित नहीं है, वह तो अपने ही एजेंडे में लिप्त है।' सोशल मीडिया पर अंध-राष्ट्रभक्त बरस पड़े : मीता अपने पति से प्यार ही नहीं करती थी; उसकी मौत से उसे खुशी हो रही है, इत्यादि।
विजेता वायुसेना के स्क्वाड्रन लीडर, निनाद मान्दव्गाने की, जो हाल में बड़गाम में हेलीकाप्टर क्रैश में मारे गए थे, विधवा हैं। पति के अंतिम संस्कार चल रहे थे और उसने संवाददाताओं से अपील की : ‘लोगों को बताओ, सोशल मीडिया पर लड़ने से कुछ हासिल नहीं होगा। अगर तुम्हारे अंदर इतनी हिम्मत है, तो जाकर सीमा पर लड़ो। अगर तुम सच में कुछ करना चाहते हो तो सुरक्षा बलों में भर्ती हो जाओ। अगर यह भी संभव नहीं, तो छोटे काम भी मददगार साबित होते हैं। अपने पड़ोस को साफ रखो। कूड़ा मत फेंको। खुले में शौच मत करो। महिलाओं को परेशान मत करो। सांप्रदायिक घृणा फैलाना बंद करो। छोटे कार्य भी बहुत दूर तक असर डालते हैं।
ज़ाहिर है, बड़बोले राष्ट्रवादियों को इन महिलाओं की बातों से आग लग गई। हिंसात्मक धमकियों का मुकाबला ये हिम्मती विधवाएं लगातार कर रही हैं। मैनपुरी में राम वकील की विधवा गीता देवी, कहती हैं कि ‘सुबूत के तौर पर हमें पुलवामा हमले के बाद अपने जवानों की लाशें मिली हैं, लेकिन पाकिस्तान पर हवाई हमलों का कोई सुबूत नहीं मिला है।’
आठ मार्च का दिन हम अपनी इन बहादुर बहनों के नाम करें और संवेदनशीलता की इनकी मांग को स्वीकार करें। उनकी आवाज से अपनी आवाज जोड़ते हुए सरकार से उनके सवालों का जवाब मांगे; शांति और भाईचारे की उनकी अपील को ताकत दें।
-लेखिका माकपा, पोलित ब्यूरो की सदस्य हैं।