भारतीय सिनेमा के शतायु होने पर उसके उज्ज्वल भविष्य की कामना पर सोहराब ‘मोदी’ के अंदाज में वह बोले, भारत और किसी मामले में भले ईमानदार न रहा हो, कम से कम मनोरंजन परोसने में पिछले सौ वर्षों से वह ईमानदार रहा है। वह बचपन से ही फिल्मों के शौकीन थे। तरुणाई में विशेष रहे। प्रौढ़ावस्था में भी सिनेमा के प्रति लगाव में गिरावट नहीं आई है। पुराने होते लोगों के साथ दिक्कत होती है कि प्रायः ‘हमारे जमाने वाली’ टीस सतह पर आ ही जाती है।
सौ साल के सफर में काफी बदल चुका है, सिनेमा। मनोरंजन पहले भी था, अब भी चालू आहे, और आगे भी रहेगा। अंतर इतना है कि पहले कहानी पर जोर दिया जाता था, अब डांस और फाइट के दम पर फिल्में चलती हैं। पचास के दशक में खुशी के गाने खेत-मैदान में और विरह के गीत खिड़की-टेबल के सहारे गाए जाते थे, और अब फॉरेन लोकेशन से कम में पड़ता ही नहीं पड़ता। दिल जो कभी मंदिर हुआ करता था, अब बदतमीज हो गया है। एक समय था, जब गुरुदत्त, बिमल राय, हृषीकेश मुखर्जी सरीखे कलाकारों के नाम पर फिल्में चलती थीं। अब कैटरीना, करीना, बिपाशा और मल्लिकाओं के आइटम नंबर दर्शकों को खींच लाते हैं।
हमारे जमाने वालों की मेमोरी में आज भी तैर जाता है वह सीन, जब क्रूर जमींदार के गुंडे निरीह नायक की पिटाई करते। घोड़े पर बैठ हंटर लहराती नाडिया का प्रवेश होता। अगले शॉट में असहाय नायक का क्लोज-अप देखते ही दर्शकों की कमेंट्री- मार, मार... मार, आय रही है नाडिया। नायक को मुक्त कराने के साथ ही दोनों के आलिंगनबद्ध होने पर खुशी मनाते दर्शक। अब मार-काट की जिम्मेदारी नायकों के खाते में है। नाडिया के बाद मीना कुमारी से लेकर नरगिस, मधुबाला, वैजयंतिमाला, वहीदा सभी पांच गज की साड़ी में लिपटी नजर आईं। नूतन और शर्मीला टैगोर ने वर्जनाओं की नदियां पारकर देह दिखाने की उदारता दिखाई, तो जलजला आ गया था।
भूले बिसरे गीत हो गए हैं सहगल, रफी, मुकेश और किशोर। अब लयात्मकता मिश्रित शब्द क्रीड़ा में डी के बोस टाइप गाने फिट कर युवाओं की ताली बटोर करोड़ों की कमाई कीजिए। कजरा मोहब्बत वाला से लेकर कजरारे-कजरारे और सिल्वर जुबली से करोड़ क्लब वाली कमाई का ये सफर बस ऐसे ही चलता रहे। नायक महानायक की गति को प्राप्त होते रहें। अमर रहे भारतीय सिनेमा, बरकरार रहे उसके दर्शक।