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कौशल ही दिलाएगा रोजगार

नारायण कृष्णमूर्ति Updated Sun, 01 Jan 2017 07:20 PM IST
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नारायण कृष्णमूर्ति
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जब कोई भारत के जनसांख्यिकीय लाभ के बारे में सुनता है, तो हाल के वर्षों में कम रोजगार सृजन को देखते हुए वह सोचता होगा कि इतने सारे युवा भारतीयों को कैसे रोजगार मिलेगा। अध्ययन बताते हैं कि प्रतिवर्ष 1.1 करोड़ स्नातक कॉलेजों से निकलते हैं, जिनमें से मात्र 20 फीसदी को अपने कौशल के अनुसार रोजगार मिलता है। देश की आबादी में महिलाओं की हिस्सेदारी 49 फीसदी है, पर मात्र 21 फीसदी महिलाएं ही कार्यबल में शामिल हैं और महज 10 फीसदी महिलाएं ही नियोजित क्षेत्र में रोजगार कर रही हैं।
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वर्ष 2014 में जब भाजपा के नेतृत्व वाली राजग सरकार सत्ता में आई थी, तो उसने अर्थव्यवस्था की कमियां दुरुस्त करने के लिए मेक इन इंडिया और डिजिटल इंडिया जैसे महत्वाकांक्षी अभियान शुरू किया, जिन पर काम चल रहा है, पर रोजगार सृजन के संकेत आने अभी बाकी हैं। पर इसके साथ-साथ अवसर और लोग बदलाव को जिस तरह स्वीकार करते हैं, वह इसका सबूत होता है कि ज्यादातर भारतीय इसे कैसे अपनाते हैं। उदाहरण के लिए, हाल की नोटबंदी को देखा जा सकता है, जिसमें इस बात को लेकर चिंता थी कि खासकर ग्रामीण इलाकों में लोग नकदी के बिना काम कैसे चलाएंगे। पर नोटबंदी ने दिखाया कि लोग कैसे तुरंत डिजिटल भुगतान की तरफ मुड़े।

उदारीकरण के पहले चरण में भारत पारंपरिक मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र को छोड़कर ताइवान, चीन और कोरिया जैसे अन्य एशियाई अर्थव्यवस्थाओं की तरह सेवा क्षेत्र की गाड़ी में सवार हो गया था। वह दांव काम कर गया और आज कृषि क्षेत्र के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था में सबसे ज्यादा योगदान सेवा क्षेत्र करता है। वह सूचना प्रौद्योगिकी की लहर पर अंग्रेजी भाषी भारतीयों के फलने-फूलने के लिए अद्भुत समय था, जिसके परिणामस्वरूप कई भारतीय आईटी दिग्गज अस्तित्व में आए। अवसरों की संभावना को भांपकर कॉलेजों और छात्रों ने सूचना प्रौद्योगिकी से संबंधित पाठ्यक्रम को अपनाना शुरू कर दिया। अचानक हर वर्ष हमारे यहां बहुत से सॉफ्टवेयर इंजीनियर निकलने लगे।
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लेकिन समय के साथ मांग और आपूर्ति में असंतुलन बढ़ने के कारण छात्रों को रोजगार मिलना मुश्किल हो गया। अब न तो वे कोर्स बदल सकते थे, न ही कोई दूसरा विकल्प चुन सकते थे। इसलिए अब हमारे पास ऐसे बहुत से योग्य इंजीनियर हैं, जो बेरोजगार हैं या जरूरी हुनर न होने के कारण दूसरे क्षेत्रों में रोजगार पाने में विफल हैं। इस बदलाव को भांपते हुए सरकार ने विकल्प के तौर पर कौशल विकास को बढ़ावा दिया है। छात्रों को कुशल बनाने का विचार और आवश्यक दक्षता के साथ युवा कार्यबल तैयार करने की मांग संभावित नियोक्ताओं द्वारा की जा रही थी। एक उत्साहजनक चलन यह दिखता है कि जिन छात्रों ने राष्ट्रीय कौशल विकास निगम द्वारा अनुमोदित कौशल विकास पाठ्यक्रम में दाखिला करवाया, उन्हें रोजगार मिला है।

नए साल में युवाओं के हित में यह है कि योग्यता के लक्ष्य के बजाय वे अपने करियर को प्राथमिकता देते हुए कौशल विकास पर ध्यान दें। यह दुखद है कि अनेक स्नातक और मास्टर डिग्री धारी युवा बैंक क्लर्क या विभिन्न राज्य सरकारों के सफाईकर्मी की नौकरी के लिए आवेदन कर रहे हैं। वास्तव में संबंधित क्षेत्र या हुनर में उत्कृष्टता हासिल करने की जरूरत है, जो उन्हें योग्यता पाने की आकांक्षा की तुलना में रोजगार हासिल करने में मदद कर सकती है। वैसे भी उन्हें योग्यता के अनुरूप काम नहीं मिल रहा। योग्यता हासिल कर बेरोजगार रहने से बेहतर है कुशल बनकर रोजगार हासिल करना।

यह एक अंतहीन चक्र है-किसी के पास योग्यता है, लेकिन संबंधित क्षेत्र में नौकरी की कमी की वजह से वह लंबे समय तक बेरोजगार रहता है और फिर जीविका के लिए किसी दूसरे क्षेत्र में रोजगार की तलाश शुरू कर देता है। आज कई कोर्सों और शैक्षिक योग्यताओं को जरूरत और कौशल के साथ तैयार किया गया है, ताकि युवा रोजगार पा सकें। यह जरूरी है कि छात्र और युवा इसे गंभीरता से लें, ताकि हमारे पास जो जनसांख्यिकीय लाभांश है, उसका अधिकतम उपयोग हो सके। अभी जिस तरह से फेसबुक और वाट्सऐप से युवा जुड़ रहे हैं, अगर रोजगार पाने के कौशल विकास के संदेश को फैलाया जाए, तो कौशल विकास असंभव नहीं रहेगा।

जिस देश में लोग फिल्मों से प्रेरित होते हैं, वहां मैं थ्री इडियट्स के अंत की तरफ ध्यान दिलाना चाहूंगा, जहां आमिर खान कहते हैं, बच्चा काबिल बनो, काबिल...कामयाबी तो झक मारके पीछे भागेगी। यह डायलॉग युवा भारतीयों के आचरण का हिस्सा बनना चाहिए और उन्हें इसका पालन करना चाहिए। उन्हें मैन्यूफैक्चरिंग, डिजिटाइजेशन, पर्यटन, स्वास्थ्य-सेवा और वित्तीय सेवाओं के क्षेत्र में कुशल बनना चाहिए, जहां योग्यता से ज्यादा कुशलता के लिए संभावनाएं हैं। इन क्षेत्रों में अपार अवसर हैं और वे तेजी से बढ़ रहे हैं।

1960 और 1970 के दशक के उदाहरण लिए जा सकते हैं, जब भिलाई, सलेम, होसूर, पुणे और अन्य शहरों में कई औद्योगिक संयंत्रों की स्थापना की गई थी। उस युग में इंजीनियरिंग क्रांति की शुरुआत हुई, स्कूली स्तर पर शहरों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा शुरू हुई, जिसने युवाओं को 1980 और 1990 के दशक में बदलते समय के अनुकूल बनने के लिए तैयार किया, जब अर्थव्यवस्था विनिर्माण से सेवा क्षेत्र की तरफ स्थानांतरित हुई।

नए वर्ष में युवाओं के हित में यह है कि ज्यादातर अवसर उनकी बाट जोह रहे हैं और जो उन्हें सुरक्षित भविष्य दे सकते हैं। स्मार्ट सिटी परियोजना के अलावा मध्यवर्गीय और ग्रामीण भारत पर जोर युवाओं की उज्ज्वल संभावनाओं का संकेत करता है। वक्त आ गया है कि युवा उपलब्ध अवसरों पर ध्यान दें और न केवल करियर के भविष्योन्मुखी रास्ते पर कदम बढ़ाएं, बल्कि आने वाले दशकों में देश को विकास के मार्ग पर भी आगे ले जाएं।
 
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