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कटहलों का वीआईपी होना

सुधाकर आशावादी Updated Sun, 22 Jun 2014 07:46 PM IST
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कल तक तो पेड़ पर ग्यारह कटहल मौजूद थे। दो कहां गायब हो गए? वह क्रोध में आग बबूला हो गए। किसकी इतनी हिम्मत कि वीआईपी इलाके में आए और कटहल ले जाए? यह देश की आंतरिक सुरक्षा का सवाल है।
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श्रीमती जी उस समय तो कुछ नहीं बोलीं। थोड़ी देर बाद बैठक में आकर बोलीं, काहे इतना किकिया रहे हो। कटहल था, कोई अमर फल नाहि, जिसमें तुम्हारी जान अटकी हो। कोई घर का ही नौकर-चाकर तोड़कर ले गया होगा।

सवाल यह नहीं है कि कितने चोरी हो गए और कितने बचे। सवाल वीआईपी इलाके में चोरी का है। यदि हमारे कटहल ही सुरक्षित नहीं हैं, तब हमारे जनप्रतिनिधि बनने का कोई औचित्य नहीं। इसलिए जरूरी है कि थाने में रपट लिखाई जाए। मामले की सीबीआई से जांच कराई जाए।
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पुलिस आई। उसने पेड़ का निरीक्षण किया। फॉरेंसिक जांच टीम ने भी कटहल के उस स्थान पर जांच का दायरा बढ़ा दिया, जहां से कटहल तोड़ने का अंदेशा था। किंतु समझ में नहीं आ रहा था कि चोरी का सही समय कैसे आंका जाए। फिर भी कानूनी औपचारिकताएं पूरी करनी ही थी। मामला वीआईपी इलाके से कटहल चोरी का था।

जांच टीमों के बंगले में आने और बाहर जाने के बीच न जाने मीडिया को कैसे भनक लग गई। मीडिया ने उन्हें घेरना शुरू किया, यह कटहल का पेड़ कब से आपके बंगले में है? पेड़ को बंगले में आपने लगाया था या यह आपको विरासत में मिला? चोरी हुए कटहल कितने बड़े थे? जब वे कटहल पेड़ पर लगे थे, तब वे कैसे लगते थे? जो दो कटहल चोरी हुए हैं, उनकी क्या कोई अन्य पहचान है, जिसके आधार पर किसी सब्जी के ठेले पर देखकर उन्हें अलग से पहचाना जा सके?

वह गदगद थे। इतना प्रचार तो उन्हें तब भी नहीं मिला था, जब वह वीआईपी बने थे। अब से पहले जब किसी वीआईपी की भैंसें चोरी हो गई थीं, तब भी उसकी इतनी चर्चा नहीं हुई थी, जितनी कटहल चोरी की हो गई। अगर उनके कटहल चोरी न गए होते, तो लोग जानते भी नहीं कि वह वीआईपी हैं।
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