हाल ही में प्रधानमंत्री ने एनडीए सांसदों से मुलाकात की। इस मौके पर आधा दर्जन मंत्रियों ने सरकार की योजनाएं और उपलब्धियां सामने रखीं। प्रधानमंत्री ने इन योजनाओं को लोगों तक पहुंचाने का निर्देश दिया, खासकर स्वच्छ भारत अभियान को। उन्होंने सांसदों से कुछ बड़ा और राजनीति से ऊपर उठकर सोचने की अपील की। निस्संदेह यह वक्त की जरूरत है।
अगर ऐसा होता है, तो इससे माननीयों के प्रति हमारी सोच बदलेगी। अभी जनप्रतिनिधियों की छवि भ्रष्टाचरण करने और संसद में हंगामा करने की ही ज्यादा है। वर्ष 1951 में हुए मुद्गल कांड से पिछली लोकसभा के रिकॉर्ड हंगामे तक का सफर इस सोच को सही भी ठहराता है। बेशक सभी जनप्रतिनिधियों को इस श्रेणी में नहीं रखा जा सकता, पर कुछ सांसदों के कारण हमारे नेताओं की साख पर संकट है। लंबे समय से सांसदों की जबावदेही ही एक बड़ा सवाल बनी रही है!
इस चिंता के बीच 16वीं लोकसभा में कुछ सकारात्मक बदलाव की उम्मीद बंधी है। यह चुनाव भले नरेंद्र मोदी के नाम पर लड़ा गया हो, पर रिकॉर्ड मतदान के वोट व्यक्तिगत रूप से सांसदों को ही मिले हैं। साफ है कि सांसदों के प्रति जनता की अपेक्षाएं बढ़ी हैं। ऐसे में खुद को प्रभावी साबित करने की बारी अब सांसदों और उनके संसदीय क्षेत्रों की है। प्रधानमंत्री के दबाव में ही सही, अगर एनडीए के सांसद जनता की उम्मीदों पर खरे उतरें, तो यह बाकी दलों के माननीयों को भी प्रेरित करेगा। हालांकि तस्वीर बदलना इतना आसान भी नहीं है। प्रधानमंत्री जब सांसदों द्वारा देश की तस्वीर सुधारने का मंत्र दे रहे थे, तभी खबर आई कि करीब 400 सांसदों ने अपनी संपत्ति का खुलासा नहीं किया है, जो नियमानुसार शपथ लेने के 90 दिनों के भीतर करना जरूरी है। खुलासा न करने वालों में हर छोटे-बड़े दल शामिल हैं।
हालांकि बदलाव की उम्मीदों के बीच कुछ बुनियादी चुनौतियों को भी समझना होगा। मसलन, संघीय ढांचे और उससे उलझती केंद्र और राज्य की राजनीति के बीच किसी सांसद से हम कितने बदलाव की उम्मीद कर सकते हैं? बेशक हरियाणा, मध्य प्रदेश या राजस्थान में एनडीए सांसदों को अपना काम करवाने या निगरानी रखने में समस्याएं न आएं, पर उत्तर प्रदेश, बिहार या अन्य गैर एनडीए शासित राज्यों में भी क्या इन सांसदों की सुनवाई होगी? यह थोड़ा मुश्किल भरा लगता है। दूसरे दलों के सांसदों-विधायकों की जिले और राज्य स्तर पर प्रशासन सुनता ही कहां है? जिलास्तरीय निगरानी समितियों की बैठकें अक्सर रस्म अदायगी भर रह जाती हैं। तभी तो सांसदों को जिले के स्तर पर अधिक ताकत देने की बात वर्षों से उठाई जाती रही है।
चूंकि इन योजनाओं का लाभ आम आदमी को ही मिलना है, ऐसे में, केंद्र सरकार की नीतियों को विपक्षी सांसद भी अगर गंभीरता से लें, तो इससे देश को ही लाभ होगा। हालांकि राजनीति से ऊपर उठकर सोचना इतना आसान भी नहीं! फिर भी कम से कम ग्रामीण विकास जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे को तो हमारे सांसद प्राथमिकता में रखकर ईमानदारी के साथ देखें। खासकर तब, जब तीस फीसदी माननीय दावा करते हैं कि वे मूलत किसान हैं!