आप स्वतंत्रता दिवस की सुबह प्रधानमंत्री का भाषण सुनें या न सुनें, हम राजनीतिक पंडितों के लिए सुनना लाजिमी होता है। सो इस बार भी सुबह-सवेरे उठकर मैंने चाय बनाई और प्याली हाथ में लिए टिक गई टीवी के सामने। जब तक प्रधानमंत्री का काफिला राजघाट होकर लाल किले तक पहुंचा, दूरदर्शन ने वहां एकत्रित वीआईपी लोगों के कई दृश्य दिखाए। स्कूल के बच्चों के दृश्य, वरिष्ठ मंत्रियों के, सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री की पत्नी गुरुशरण कौर के और उन विदेशी राजनेताओं के, जो प्रधानमंत्री के भाषण का इंतजार कर रहे थे। इन नजारों को देखकर याद आया मुझे कि एक जमाना था, जब हम पत्रकार चांदनी चौक से पैदल चलकर आया करते थे इंदिरा गांधी के भाषण सुनने।
सुरक्षा की कोई समस्या नहीं थी उन दिनों। सो दिल्ली के आम लोग भी उसी रास्ते से आया करते थे प्रधानमंत्री का भाषण सुनने। जिनको लाल किले के प्राचीर के नीचे जगह नहीं मिलती थी, वे चांदनी चौक की सड़क पर बैठकर सुन लेते थे प्रधानमंत्री की बातें। आज आम आदमी का साया तक नहीं दिखता है इस वीवीआईपी सभा में, लेकिन प्रधानमंत्री जी संबोधित उसी को करने की कोशिश करते हैं अपने भाषण में। अजीब स्थिति है न!
इस वर्ष प्रधानमंत्री का भाषण सुनते समय जो बात मुझे उससे भी ज्यादा अजीब लगी, वह यह कि उनके भाषण लिखने वालों को इतना भी नहीं मालूम कि इस देश का आम आदमी अब सयाना हो गया है। उसको आसानी से धोखा नहीं दिया जा सकता, लंबी-चौड़ी सरकारी उपलब्धियों की सूची पेश करके। लेकिन प्रधानमंत्री ने ऐसा ही किया।
पहले प्रशंसा की नेहरू-गांधी परिवार की। माना कि डॉक्टर साहब प्रधानमंत्री बने हैं इस परिवार की मेहरबानी की वजह से, लेकिन उनकी इतनी प्रशंसा स्वतंत्रता दिवस के ऐतिहासिक मौके पर अच्छी नहीं लगी। भारत कोई उत्तर कोरिया जैसा तानाशाही देश नहीं, जहां तानाशाह सलामत की प्रशंसा काफी न हो, तो खैर नहीं। नेहरू-गांधी परिवार की प्रशंसा करने के बाद उन्होंने अपनी सरकार की तथाकथित उपलब्धियां गिनाईं और वह भी इतने उबाऊ ढंग से कि उनके एक दो मंत्री सोते हुए दिखाई दिए।
ट्वीटर पर कई लोगों ने इसका जिक्र किया और साथ-साथ यह भी कहा कि प्रधानमंत्री का भाषण सुनकर उनको गंभीर निराशा हुई। सच पूछिए, तो मुझे भी कुछ ऐसा ही लगा और शायद इसीलिए नरेंद्र मोदी का भाषण बहुत अच्छा लगा। गुजरात के मुख्यमंत्री के आलोचकों ने टीवी चैनलों पर कहा तो जरूर है कि उनको इस तरह प्रधानमंत्री को चुनौती नहीं देनी चाहिए थी स्वतंत्रता दिवस के मौके पर, लेकिन मैं उनकी बातों से सहमत नहीं हूं। इसलिए कि मोदी ने बिल्कुल वैसा भाषण दिया, जैसा प्रधानमंत्री को देना चाहिए था लाल किले के प्राचीर से।
नरेंद्र मोदी ने अपना भाषण शुरू किया उन स्वतंत्रता सेनानियों को प्रणाम कर, जिन्होंने इस देश की आजादी की लड़ाई के दौरान कुर्बानियां दीं। 15 अगस्त को अगर हमारे प्रधानमंत्री उनको याद नहीं करेंगे, तो कब करेंगे? मोदी ने उनको सलाम करने के बाद अपने पूरे भाषण में उन मुद्दों पर ध्यान दिया, जिनसे इस देश का आम आदमी परेशान है। भ्रष्टाचार का मुद्दा, सुशासन के अभाव का मुद्दा, महंगाई और बेरोजगारी के मुद्दे, गरीबी का मुद्दा। इनका जिक्र करते हुए उन्होंने यह भी याद दिलाया कि ये वही समस्याएं हैं, जिनका जिक्र मिलता है स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के भाषणों में। आज तक इन समस्याओं का समाधान अगर हम ढ़ूंढ नहीं पाए हैं, तो दोष किसका है?
मोदी के दुश्मन उतने ही हैं अपने इस भारत महान में, जितने उनके प्रशंसक हैं, तो शायद वह कभी न दे सकेंगे लाल किले से भाषण स्वतंत्रता दिवस के मौके पर। लेकिन इतनी तो हम उम्मीद कर सकते हैं न कि अगले वर्ष जो भी बोलेगा ऐतिहासिक किले के इस प्राचीर से, वह अपने भाषण में कुछ ऐसी ही बातें करेगा, जैसी इस साल मोदी ने की है।
इस वर्ष अगर स्वतंत्रता दिवस के जश्न का माहौल निराशा, मायूसी और चिंता का था, तो सिर्फ इसलिए कि बहुत दिनों से राजनीतिक नेतृत्व का सख्त अभाव महसूस कर रहा है इस देश का आम आदमी। सोनिया-मनमोहन सरकार के दशक लंबे शासनकाल से हमने सबसे महत्वपूर्ण सबक यही सीखा है कि प्रधानमंत्री पद को कमजोर करने से कमजोर हो जाता है देश।