भारत में क्या वाकई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खतरा मंडरा रहा है? सहिष्णुता और उदार मूल्यों को क्या आग में झोंका जा रहा है? कई विरोध प्रदर्शनों और टेलीविजन पर होने वाली बहसों ने इन सवालों के इर्द-गिर्द घूम रहे विवादों को जिंदा रखा है। किसी को भी किसी किताब का कोई अध्याय या कोई पैराग्राफ या फिर कोई वाक्य नागवार लग सकता है। ऐसे लोगों के निशाने पर संगीत, फिल्में, नाटक, आलेख, अखबारों में छपने वाले कॉलम या ऐसा कुछ भी हो सकता है।
यहां तक कि किसी कार्टून को लेकर भी कोई नाखुशी जाहिर कर सकता है। जल्द ही, हंगामा बरपाने वाले
इस पार्टी से या उस पार्टी से जुड़कर हरकत में आ
जाते हैं सड़कों पर उग्र प्रदर्शन और टीवी पर बहसें
तेज हो जाती हैं।
थोड़े दिन पहले इस बात पर उत्तेजना फैली कि एक साहित्य सम्मेलन में समाजशास्त्री आशीष नंदी ने दलितों और भ्रष्टाचार के बारे में क्या कहा? तो दूसरे सप्ताह, कश्मीरी किशोर लड़कियों का एक समूह निशाने पर था, जिसने आम लोगों के बीच रॉक म्यूजिक पेश करने की हिम्मत दिखाई।
मशहूर फिल्म निर्माता और अभिनेता कमल हासन भी निशाने पर आ गए, क्योंकि आतंकवाद को लेकर बनाई गई उनकी एक सनसनीखेज जासूसी फिल्म के कुछ दृश्य इन तत्वों को अपमानजनक लगे। वैसे नग्न चित्रकारी करने वालों के खिलाफ हमेशा से लोगों का एक समूह आग उगलता रहा है और इस तरह ऐसी घटनाएं बढ़ने लगीं।
विवाद जन्म लेते हैं, फिर पुराने पड़ जाते हैं और धीरे-धीरे गायब हो जाते हैं। इस खाली जगह पर नए चरित्रों के साथ नए विवादों का कब्जा हो जाता है। इस तरह उच्च तीव्रता वाले विरोध प्रदर्शनों की मौजूदगी बरकरार रहती है। तो क्या भारत में असहिष्णुता बढ़ रही है? कई समाजविज्ञानियों का मानना है कि किसी उदारवादी कथन या क्रिया के खिलाफ अक्सर जवाबी हिंसक प्रतिक्रिया ऐतिहासिक रूप से अपरिहार्य है।
वे कहते हैं कि यह वयस्क मताधिकार पर आधारित लोकतंत्र जैसी एक क्षैतिज प्रणाली के खिलाफ एक गहरे सामंती, वर्गीकृत और लंबवत संरचना वाले समाज की प्रतिक्रिया है, क्योंकि उन्हें लग रहा है कि यह उन पर थोपा जा रहा है।
मेरे ख्याल से, यहां एक दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा है, जिसका हमें सामना करना चाहिए। थोड़ी देर के लिए अतिवादियों को भूल जाइए जो इस वोट बैंक या उस वोट बैंक पर अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखने के लिए इस तरह के संकट पैदा करने में अभ्यस्त हैं। लेकिन आखिर ऐसा क्यों है कि हम उदारवादी, समाज के उन ज्यादातर लोगों का विश्वास जीतने में भी सक्षम नहीं हैं, जिनका किसी भी मुद्दे पर मजबूत और निश्चित विचार नहीं है?
मामला किसी मुद्दे को अपनी तरह से देखने का है। अगर हम उस स्थिति में आक्रोशित होते हैं जब किसी बोलने या लिखने या एक निश्चित तरीके से प्यार करने या निंदा करने के अधिकार से वंचित किया जाता है, लेकिन तब हमारे भीतर गुस्सा नहीं पनपता जब लाखों लोगों को उनकी मूलभूत जरूरतों का हक नहीं दिया जाता। ऐसे में हम केवल अपने जैसे लोगों के साथ जुड़े खतरों को लेकर प्रतिक्रिया करते हैं।
लेकिन एक अलग तरह की रणनीति की जरूरत है। जैसा कि कोई सफल विक्रेता जानता है कि अगर इस प्रतिस्पर्धी बाजार में आप अपना माल बेचना चाहते हैं, तो सबसे पहले अपने उपभोक्ता से जुड़ना होगा। यह बात मुझे कई साल पहले उस वक्त समझ में आई, जब मैं एचआईवी और एड्स फैलने के बारे में राजस्थान के शेखावटी क्षेत्र में शोध कर रही थी। उस समय राजस्थान में एड्स बातचीत का विषय नहीं था।
इस गरीब राज्य से पुरुष रोजी-रोटी की तलाश में मुंबई जैसे शहरों की ओर रुख करते थे। अध्ययनों में यह बात सामने आनी शुरू हो गई थी कि यौन संचरित संक्रमणों और मौतों में इजाफे की वजह एचआईवी और एड्स हैं। लेकिन इलाके में चिन्हित निगरानी स्थलों की कमी के कारण आधिकारिक गणनाओं में यह साबित नहीं हो पा रहा था।
सूखा और पानी की कमी राजस्थान के लिए बड़ा मुद्दा था। राज्य में ज्यादातर स्थानीय स्वयंसेवी संस्थाएं और सामुदायिक समूह उस समय पानी से जुड़ी समस्याओं पर काम कर रहीं थी। बहुत कम को एड्स के बारे में कुछ पता था। ऐसे में सामुदायिक कर्मी उन लोगों से किस तरह सुरक्षित यौन संबंध के बारे में बात करते जो रोजाना पानी की कमी को लेकर जूझते थे?
ऐसे में उनमें से एक ने मुझे कुछ बातें बताईं। दरअसल गांवों में कृषक समुदाय के साथ आखिर हमारा वह कौन सा जुड़ाव था जिससे वास्तव में हमारी मदद हो सकती थी? राजस्थान में सब कुछ पानी या उसकी कमी के इर्द-गिर्द घूमता है।
हमने अपने परियोजना क्षेत्र में लोगों से उनकी फसलों, सूखे की स्थिति, बारिश, पशुओं के लिए चारा आदि के बारे में जानकारी हासिल करके बातचीत शुरू की क्योंकि ये सभी एक-दूसरे से जुड़ी हुईं थी। अगर बारिश नहीं होती है तो जाहिर है फसल चौपट हो जाएगी और पशुओं के लिए चारा भी उपलब्ध नहीं हो सकेगा। पशुओं की मौत हो जाएगी और बच्चों को खाना नहीं मिल सकेगा।
ऐसे में तंगहाल किसान काम की तलाश में गांव छोड़ने पर मजबूर हो जाएंगे। इसके बाद हमारे कार्यकर्ताओं को परिवारों से उनके बच्चों के स्वास्थ्य, पल्स पोलियो अभियान और प्रतिरक्षण की जरूरत के बारे में बात कर सकेंगे। इसने हमें बीमारी के बारे में बातचीत करने का एक मौका दिया।
धीरे-धीरे हम एचआईवी और एड्स जैसे उभरते रोगों पर भी बातचीत करने लगे। यह दृष्टिकोण तकरीबन हर परिस्थिति में काम करता है। जिन लोगों को आप प्रभावित करना चाहते हैं पहले उनसे आपको जुड़ना होगा। अन्यथा हम बदलाव के बारे में हमेशा उपदेश देते रहेंगे।