अमेरिका की जनतांत्रिक ‘व्यवस्था’ या राजनीतिक प्रणाली वहां के नागरिकों समेत अधिकांश लोगों के लिए एक तिलिस्म ही है। यों यह बात मशहूर है कि इसकी पुख्ता नींव ‘शक्तियों के विभाजन तथा संतुलन’ पर रखी गई है और यही इसकी ताकत है, लेकिन इस घड़ी नींव का यह पत्थर ही ओबामा के लिए कमरतोड़ बोझ बन गया है।
आज दुनिया आंखें फाड़ यह तमाशा देख रही है कि सर्वशक्तिमान समझा जाने वाला अमेरिकी राष्ट्रपति यदि संसद की ‘सलाह और सहमति’ की उपेक्षा करता है, तो अचानक कितना लाचार-असमर्थ बन सकता है। वार्षिक बजट को पास न कर वहां की संसद ने सरकार का कामकाज ठप्प कर दिया है। जो नाटकीय मुहावरा सुर्खियों में छाया है, उसके अनुसार ‘अमेरिका बंद है!’
वहां यह संकट पहली बार नहीं आया है। अब तक कुल मिलाकर सत्तरह ऐसे मौके आ चुके हैं, जब सांविधानिक ‘जिच’ जैसी स्थिति देखने को मिली है। दूसरी बात जो रेखांकित करने वाली है, वह यह कि सरकार बंद होने या उसका कामकाज बाधित होने वाला मुद्दा सिर्फ केंद्र सरकार पर लागू होता है। अमेरिका की संघीय प्रणाली में प्रदेश सरकारें स्वायत्त हैं, इसलिए उनका कामकाज अबाध चलता रहेगा और नागरिकों का जीवन एकाएक पटरी से नहीं उतर जाएगा।
सवाल यह पैदा होता है कि फिर इतनी हायतौबा क्यों मचाई जा रही है। असल में, शोरगुल नाजायज नहीं है। सरकार पूरी तरह ‘ठप्प’ भले न हुई हो या अमेरिका ‘बंद’ होने के बाद भी ‘खुला’ काम करता नजर आ रहा हो, लेकिन उसकी भद तो पिटी है। अमेरिकी राष्ट्रपति को अपने पूर्वघोषित दौरे रद्द करने पड़े हैं।
ओबामा वीटो का इस्तेमाल कर सरकार द्वार उधार लेने की सीमा बढ़ा सकते हैं, पर हालत भारत सरकार के बदनाम अध्यादेशों जैसी है। देर-सबेर इनको संसद से अनुमोदित कराना ही होगा। रस्साकशी चलती रहेगी और गतिरोध टूटने की कोई संभावना नहीं है।
साफ है कि उस देश में भी नीतिगत विषयों पर सर्वसहमति नहीं। अनेक महत्वपूर्ण मुद्दों पर जनमत दोफाड़ है। गहरी दरारें और विस्फोटक तनाव निर्णायक राजनीतिक फैसले लेना तथा इनको लागू कराना कठिन बनाते रहे हैं। इस बार भी ओबामा के जनहितकारी स्वास्थ्य कार्यक्रम को लेकर गंभीर मतभेद ने ही सरकार ठप्प करवाई है।
बहरहाल, हाल के दिनों में जाने कितनी बार हिंदुस्तान में भी कभी जन लोकपाल, तो कभी खाद्य सुरक्षा विधेयक को लेकर ऐसी ही घातक भिड़ंत देखने को मिलती रही है। फर्क सिर्फ इतना है (और यह फर्क बेहद महत्वपूर्ण है) कि अपने यहां शासक वर्ग की विश्वसनीयता नष्ट हो चुकी है और आम आदमी को लगता है कि लड़ाई सैद्धांतिक नहीं, नूरा कुश्ती सरीखी है।
न्यस्त स्वार्थ अपने हितों की हिफाजत के लिए ही सांविधानिक संकट की नौटंकी जारी रखते हैं। अमेरिका में दलगत पक्षधरता का अटूट पारंपरिक संबंध सरकार की भूमिका के बारे में बुनियादी सोच से है। क्या जनकल्याणकारी नीति के बहाने नागरिक के जीवन में प्रशासन का हस्तक्षेप जायज है? क्या सरकार उन क्षेत्रों को अपना कार्याधिकारक्षेत्र बनाने की चेष्टा कर सकती है, जो निजी उद्यम अथवा मुक्त बाजार-व्यापार का संसार हैं?
जब से भूमंडलीकरण का सूत्रपात हुआ है, तब से ये सारे सवाल हमारे सामने भी मुंह बाए खड़े हैं। आर्थिक सुधार तथा उदारीकरण के बाद भारत ने भी समाजवाद का हठ छोड़ दिया है। खुलकर खुद को पूंजीवादी कहते हम झिझकते हैं, पर मौजूदा केंद्र सरकार पर कॉरपोरेट जगत का प्रभाव जग जाहिर है।
निजी बनाम सार्वजनिक, शहर बनाम देहात तथा उद्योग बनाम खेती-बाड़ी जैसे द्वंद्व हमारी राजनीति में उथल-पुथल मचाते रहे हैं। आर्थिक-सामाजिक विषमता पर लीपापोती के लिए ही सत्तारूढ दल तथा नेता सांप्रदायिकता-धर्मनिरपेक्षता-जाति-क्षेत्र जैसे विषयांतर करने में व्यस्त रहते हैं। इस सबके साथ-साथ ‘करिश्माई नेतृत्व’, ‘नई पीढ़ी की संभावना’, ‘फासीवादी ताकतों’ का उदय जैसे मुहावरे हमारा ध्यान हमारी राजनीतिक प्रणाली की कमजोरियों से बंटाते रहते हैं।
मौकापरस्त शासक जितनी उतावली से सांविधानिक संशोधन कर खुद को निरापद, खुशहाल रखने को सक्रिय नजर आते हैं, उसका शतांश भी राजनीतिक प्रणाली या चुनाव प्रक्रिया को निष्पक्ष-निर्भय-निर्दोष बनाने में नहीं दिखाई देता। यदि अमेरिका के बहाने ही सही, हम अपने देश में संघीय ढांचे, सत्ता के विभाजन और सांविधानिक संस्थाओं तथा अधिकारियों के बीच शक्ति संतुलन के बारे में गंभीरता से सोचना शुरू कर सकें, तो यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि होगी।
अमेरिका के इस ‘संकट’ के तात्कालिक प्रभाव कम नहीं हैं। जब अमेरिकी नागरिकों को वेतन नहीं मिलेगा, तो वे खर्च कैसे करेंगे? वे खर्च नहीं करेंगे, तो मंदी से बीमार बाजार की तबीयत कैसे सुधरेगी? अगर कुबेर समझा जाने वाला अमेरिका अपने उधार की किस्तें समय से नहीं चुका पाएगा, तब उसकी साख का क्या होगा?
स्पष्ट है कि अमेरिकी सरकार के ‘ठप्प’ होने का असर दुनिया भर पर पड़ेगा। पर ठंडे दिमाग से यह भी सोचने की जरूरत है कि कहीं यह भी एक नूरा कुश्ती तो नहीं? सीरिया हो या स्नोडन वाला प्रकरण, हाल के दिनों में अमेरिकी सरकार की गैरकानूनी हरकतें विश्वव्यापी चिंता का विषय बनी हैं। यह आर्थिक-सांविधानिक संकट उनसे ध्यान बंटाने में कामयाब रहा है।
एक अमेरिकी लाल बुझक्कड़ ने फरमाया है कि अगर आज आठ लाख सरकारी कर्मचारी गैरजरूरी पहचाने गए हैं, तो भला इनको बहाल करने की क्या मजबूरी है? जाहिर है, सरकार इनके बिना भी चल सकती है, चल रही है!