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क्या वे स्थायी दोस्त बन पाएंगे

रहीस सिंह Updated Wed, 02 Oct 2013 07:24 PM IST
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अभी कुछ समय पहले तक अमेरिका ईरान के खिलाफ इस तरह खड़ा था, मानो चूहे-बिल्ली के खेल को समाप्त करने का वक्त आ गया हो। पर सितंबर के अंतिम सप्ताह में वही अमेरिका ईरान के साथ खड़ा होने को बेताब दिखा। आखिर क्यों? संयुक्त राष्ट्र महासभा से अमेरिकी राष्ट्रपति ने ईरान को परंपरागत शत्रुता भुलाकर अन्योन्याश्रित संबंध बनाने का संदेश दिया। ईरान के प्रति ओबामा के नजरिये में आया बदलाव क्या अमेरिका की मानसिकता में आई तब्दीली का संकेत है या फिर किसी नई रणनीति का हिस्सा ? यदि यह बदलाव है, तो क्या इसे रिपब्लिकन भी स्वीकार कर लेंगे? लेकिन अगर यह नई रणनीति का हिस्सा है, तो आंख-कान खुले रखने की जरूरत है, क्योंकि साम्राज्यवादी रणनीतियां ऐसे खेलों को अंजाम देती हैं, जिससे दुनिया संकट की ओर खिसक जाती है। चूंकि तीस साल बाद अमेरिका और ईरान के राष्ट्राध्यक्षों के बीच संवाद कायम हुआ है, इसलिए इसे एक अंतरराष्ट्रीय घटना के रूप में देखा जा सकता है। तो क्या अब खाड़ी में नया रणनीतिक समीकरण बनेगा? ऐसे में क्या यह संभव नहीं कि खाड़ी क्षेत्र में अब रूस और चीन किसी नए खेल की शुरुआत करें?
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जहां तक अमेरिका का सवाल है, तो यह जानना चाहिए कि साम्राज्यवाद का न तो स्थायी शत्रु होता है, न ही स्थायी मित्र। इस समय अमेरिका की क्रूड ऑयल लॉबी की मंशा यह है कि मित्रता या शत्रुता तेल स्रोतों पर प्रभावपूर्ण नियंत्रण को केंद्र में रखकर हो, फिर चाहे वह इराक की तरह ध्वंस करके संभव हो अथवा सऊदी जैसे देशों के साथ संधि करके या फिर लीबिया की तरह। दूसरी तरफ रिपब्लिकन चाहते हैं कि अमेरिका ईरान को सबक सिखाए। पर इस समय अमेरिका की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है। दूसरी तरफ सीरिया पर पुतिन की कूटनीतिक विजय ने अमेरिका के लिए और अधिक तगड़ी चुनौतियां पेश कर दीं। इसके बाद अमेरिकी बौद्धिक जगत से लेकर वैश्विक कूटनीतिक गलियारे तक में पुतिन प्रतिष्ठित हो गए। इसलिए अमेरिका को एक नई रणनीति की जरूरत पड़ी।

जहां तक रोहानी का मामला है, तो वह एक अर्द्ध-धार्मिक शासन व्यवस्था से जुड़े हैं, इसलिए उनकी नीतियां भी बहुत स्पष्ट और स्थायी नहीं हो सकतीं। लेकिन उनका इरादा यह है कि विश्व व्यवस्था में अलग-थलग पड़ा उनका देश अब अलगाव को समाप्त कर मूल धारा में आए। लेकिन क्या रोहानी इसके लिए आवश्यक कदम उठाने में सक्षम होंगे? अभी तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि वह इस तरह की कार्रवाई के लिए वास्तविक रूप में अधिकृत हैं या नहीं।
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चूंकि यह मुद्दा बहुत ही संवेदनशील है, इसलिए रोहानी चाहते हैं कि इसकी तैयारी भी विधिवत हो। लेकिन एक दूसरा सच यह भी है कि रोहनी ओबामा से हाथ मिलाने के लिए स्वतंत्र ही नहीं थे। फिर भी उन्होंने ऐसा करने का साहस दिखाया, तो इसे वैश्विक शांति की उनकी महत्वाकांक्षा का एक आधारभूत पहलू ही मानना चाहिए है। तेहरान का एक और पक्ष रिवोल्यूशनरी गार्ड क्रॉप्स है, जिसके राजनीतिक प्रभाव की स्थापना हुए लंबा समय बीत चुका है।

ये लगभग सभी विदेशी नीतियों एवं उनसे जुड़े मुद्दों पर गिद्ध दृष्टि रखते हैं। इसलिए जब तक इनकी मनोदशा नहीं बदलती, सार्थक हल निकलने वाला नहीं है। हालांकि पिछले ही महीने ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्लाह खमेनई ने इस दिशा में कुछ कदम उठाने की कोशिश की। वैसे तेहरान परमाणु कार्यक्रम के कारण प्रतिबंधों से आच्छादित हो चुका है। दो बातें अब भी महत्वपूर्ण हैं। एक यह कि अभी ओबामा को रोहानी पर और रोहानी को ओबामा पर विश्वास नहीं है। दूसरा यह कि ओबामा की उदारता ईरान के थोड़े से बोझ को ही हल्का कर सकती है। अमेरिकी कांग्रेस द्वारा लिए निर्णयों को बदलना ओबामा के वश में नहीं है, क्योंकि रिपब्लिकन ऐसा होने नहीं देंगे। रोहानी ने समझौते के लिए हामी इसलिए भरी है, क्योंकि कांग्रेस और अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा आयद दबावों को बर्दाश्त करने की क्षमता अब उनमें नहीं है। इससे एक बात तो साबित हो जाती है कि ईरान के लिए अमेरिकी मित्रता आवश्यकता की उपज है, न कि सद्भावना की तात्कालिक उत्पत्ति। पर क्या अमेरिका अब ईरान को स्थायी मित्र बना पाएगा? अगर ऐसा नहीं है, तो ईरान के समक्ष चुनौतियां और जटिल हो जाएंगी।
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