प्रदेश में निवास कर रहे अनुसूचित जाति, जनजाति के ऐसे लोग जिनके पास मूल और स्थायी निवास प्रमाणपत्र नहीं है, उन्हें भी अब जाति प्रमाणपत्र जारी होगा। इससे लोग समाज कल्याण विभाग की विभिन्न योजनाओं का लाभ उठा सकेंगे। इससे तकरीबन दो लाख युवा लाभान्वित होंगे।
ताजा व्यवस्था में अभी बिना निवास प्रमाणपत्र के लोगों के जाति प्रमाणपत्र नहीं बनाए जाते। मुख्यमंत्री हरीश रावत के निर्देश के बाद शासन ने इस संबंध में प्रस्ताव तैयार करना शुरू कर दिया है। साथ ही नियमावली में संशोधन भी किया जाएगा।
प्रदेश के विभिन्न जिलों में तकरीबन पांच लाख से अधिक परिवार ऐसे हैं जिनके पास मूल और स्थायी प्रमाणपत्र नहीं है। इससे जाति प्रमाणपत्र नहीं बन पाता। उन्हें समाज कल्याण और केंद्र सरकार की अनुसूचित जाति, जनजाति की योजनाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है।
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केंद्र के एक्ट में अनुसूचित जाति, जनजाति कि योजनाओं का लाभ देने के लिए निवास प्रमाणपत्र की अनिवार्यता होने का जिक्र नहीं है। एक्ट में सिर्फ यह कहा गया है कि व्यक्ति एससी, एसटी की लिस्ट में हो।
केंद्र के एक्ट में जिक्र के बिना राज्य में कर दिया प्रावधान
हरीश रावत
- फोटो : Self
बावजूद प्रदेश में इसके लिए मूल या निवास प्रमाणपत्र अनिवार्य कर दिया गया है। अब शासन इस अनुसूचित जाति, जनजाति के मामले में निवास प्रमाणपत्र की अनिवार्यता हटाने के मूड में है। व्यक्ति के निवास के साक्ष्य के तौर पर आधार कार्ड, वोटर लिस्ट, बिजली, पानी का बिल आदि को आदि को साक्ष्य बनाने की योजना है।
प्रदेश की मलिन बस्तियों और नदी किनारे झुग्गी-झोपड़ी में रहने वालों के पास भूमि के मालिकाना हक संबंधी कागजात नहीं है। इससे उनका निवास प्रमाणपत्र नहीं बन पाता और वह कल्याणकारी योजनाओं, छात्रवृत्तियों से वंचित हैं।
बिना निवास प्रमाणपत्र के अनुसूचित जाति, जनजाति के लोगों के जाति प्रमाणपत्र बनाने के लिए मुख्यमंत्री हरीश रावत को पत्र दिया है। मुख्यमंत्री ने इस संबंध में सचिव समाज कल्याण डा. भूपिंदर कौर औलख को निर्देश दे दिए हैं। मलिन बस्तियों और दूसरे कई स्थानों पर रहने वालों के पास भूमि के कागजात नहीं हैं। उनके बच्चों की फीस माफ नहीं हो पाती, छात्रवृत्ति नहीं मिलती। जल्दी ही इस संबंध में जीओ जारी हो जाएगा
-राजकुमार, संसदीय सचिव, अध्यक्ष मलिन बस्ती सुधार समिति उत्तराखंड