सभी दलों के उम्मीदवारों के ऐलान के बाद धर्मनगरी हरिद्वार में चुनावी महाभारत की तस्वीर अब साफ हो गई है। इस सीट की खासियत यह है कि यहां कोई भी दल अपने वर्चस्व का दावा नहीं कर सकता।
हरिद्वार ने सबको जिताया है, सबको हराया है। यहां की समर भूमि में सभी को संघर्ष करना पड़ता है। इस बार यहां मोदी लहर और हरीश सरकार के बीच जंग तय है।
हरीश रावत की अग्निपरीक्षा
हरीश रावत के प्रतिनिधित्व वाली सीट से उनकी पत्नी रेणुका रावत की उम्मीदवारी के चलते यहां मुख्यमंत्री की अग्निपरीक्षा भी होगी।
भाजपा की ओर से यहां पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक उम्मीदवार हैं। वैसे तो और भी प्रत्याशी यहां से दम भर रहे हैं, लेकिन मुख्यमंत्री की पत्नी का मुकाबला मुख्य रूप से निशंक से ही माना जा रहा है।
जिले की खराब कानून-व्यवस्था, गन्ना किसानों का बकाया और बार-बार आने वाली बाढ़ से बचाने के इंतजामात यहां के लिए बड़े मुद्दे हैं।
कांग्रेस ने उतारा सीएम की बीबी
बरसों पहले अल्मोड़ा से लोकसभा चुनाव हारीं हरीश रावत की पत्नी रेणुका रावत इस बार यहां मैदान में हैं। आपातकाल (1977) के बाद कांग्रेस इस सीट पर तीन बार ही जीत सकी। इसलिए हरिद्वार को कांग्रेस के लिए माकूल कहना भी ठीक नहीं होगा।
पति हरीश रावत की सीट होने के साथ उनका मुख्यमंत्री होना, उन्हें टिकट मिलने की सबसे बड़ी वजह मानी जा रही है।
राज्य सरकार से मायूस लोगों की नाराजगी भी रेणुका को झेलनी पड़ सकती है। पिछले वर्ष आई बाढ़ में तबाह हुए कई गांवों के लोग हिसाब मांगेंगे। जिले में हुई डकैती, लूट, हत्या, बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों का खुलासा नहीं होने से भी नाराजगी है। लोग अमन चैन चाहते हैं।
1999 के बाद बीजेपी नहीं जीती यहां
भाजपा ने इस सीट पर आपातकाल के बाद चार बार जीत पाई है। यह सिलसिला रामलहर के बाद 1991 से शुरू तो हुआ लेकिन 1999 के बाद भाजपा यहां जीत के लिए तरस गई।
भाजपा प्रत्याशी निशंक वैसे तो चतुर राजनीतिज्ञ माने जाते हैं, लेकिन यहां मुकाबला सीधे मुख्यमंत्री से है। निशंक सरकार में हुए कथित घोटालों को हरीश रावत चुनावी मुद्दा बना रहे हैं।
भाजपा संगठन मजबूत है, कई विधायक भी हैं, लेकिन मदन कौशिक को टिकट नहीं मिलने से एक वर्ग में नाराजगी है।
भाजपा को साधु-संतों पर भरोसा
सियासी जानकारों की मानें तो निशंक को हरिद्वार में ‘ग्रासरूट’ पर जाकर ही जीत का रास्ता निकालना होगा। वैसे, भाजपा को यहां साधु-संतों का भी भरोसा है।
हालांकि, साधु-संत तो यहां कांग्रेस के भी हैं। योगगुरु रामदेव की यह कर्मभूमि है। बाबा मोदी को पीएम बनवाने का संकल्प लेकर देशभर में घूम रहे हैं।
बसपा कभी नहीं जीती
बसपा ने यह सीट कभी नहीं जीती। 1999 व 2004 में दूसरे स्थान पर जरूर रही। पिछली बार एक मजबूत मुसलिम प्रत्याशी मोहम्मद शहजाद तीसरे स्थान पर खिसक गए।
शहजाद विधायक थे। लेकिन अब जिस हाजी इस्लाम को बसपा ने टिकट दिया, उनकी सियासत का ककहरा तो पंचायत की राजनीति से ऊपर का नहीं है। इस पर भी संदेह है कि हाजी इस्लाम चुनाव में शहजाद जैसा प्रदर्शन कर पाएंगे।
क्योंकि मोदी लहर में मुसलिम मतों का ध्रुवीकरण कांग्रेस के पक्ष में होने की संभावना जताई जा रही है। 2004 में हरिद्वार को यूपी में शामिल कराने के मुद्दे पर चुनाव जीती समाजवादी पार्टी अब यहां अपना वजूद बचाने के लिए जद्दोजहद कर रही है।
पार्टी ने मजबूरी में पूर्व घोषित उम्मीदवार अजमल नवाज खान को यहां से बदला है। उनके स्थान पर पुरानी भाजपाई अनिता सैनी को प्रत्याशी बनाया है।
अनिता का सपा में ही स्थानीय स्तर पर विरोध हुआ। मुलायम की वजह से यहां भी पार्टी को मुसलिम मतों का आसरा तो है, लेकिन पिछले चुनाव में अम्बरीष जैसे कद्दावर भी इस खेल में शिकस्त खा चुके है।
अम्बरीश कांग्रेस का दामन थाम चुके हैं। ‘आप’ ने यहां से पहली महिला आईपीएस व पूर्व डीजीपी कंचन चौधरी भट्टाचार्य को मैदान में उतारा है।
हरिद्वार संसदीय सीट के उम्मीदवार
कांग्रेसः रेणुका रावत
विशेषता: सीएम हरीश रावत की पत्नी। चुनाव लड़ने का अनुभव भी है।
कमजोरी: कभी चुनाव नहीं जीती, सत्ता विरोधी फैक्टर से भी सामना, केवल पति के मुख्यमंत्री होने के भरोसे चुनाव मैदान में
भाजपाः रमेश पोखरियाल निशंक
विशेषता: 25 साल से चुनावी राजनीति में सक्रिय। प्रदेश के सीएम रहे। हरिद्वार संसदीय क्षेत्र के तहत आने वाली डोईवाला सीट से विधायक हैं।
कमजोरी : हरिद्वार जिले में मजबूत टीम का अभाव। मदन कौशिक जैसे स्थानीय दिग्गजों की नाराजगी बरकरार।
बसपाः मोहम्मद हाजी इसलाम
विशेषता: पंचायत की राजनीति में सक्रियता। बसपा कैडर वोट के साथ मुसलिम वोटों का भरोसा।
कमजोरी: संसदीय चुनाव का अनुभव नहीं। पार्टी के दो विधायकों सुरेंद्र राकेश व हरिदास के निलंबन से नुकसान की आशंका।
आपः कंचन चौधरी भट्टाचार्य
विशेषता : उत्तराखंड की डीजीपी रहीं। अब भी सक्रिय। उच्च वर्ग व महिलाओं में लोकप्रिय
कमजोरी: चुनाव का तजुर्बा नहीं है। आप का सागंठनिक ढांचा नहीं होने से नुकसान की आशंका। मुद्दे भी नहीं है।
सपाः अनिता सैनी
विशेषता: पंचायत की राजनीति में सक्रिय रहीं। सैनी समाज के साथ ही अन्य ओबीसी और सपा के बहाने मुसलिम मतों का सहारा।
कमजोरी: संसदीय चुनाव का अनुभव भी नहीं, जिले में सपा का संगठन भी कमजोर है।
कुल मतदाता---1553307
महिला----709666
पुरुष---843641