देश की विरासत चनौदा में 1937 में महात्मा गांधी की प्रेरणा से स्थापित उत्तराखंड के पहले क्षेत्रीय गांधी आश्रम का अस्तित्व खतरे में है। आश्रम घाटे में तो है ही, भवन भी जर्जर हालत में है। कई मशीनें टिनशेड में रखी हैं।
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जब महात्मा गांधी 1929 में कुमाऊं के अल्मोड़ा, ताकुला, ताड़ीखेत की यात्रा पर थे तो कौसानी जाते समय वह कुछ देर चनौदा में रुके।
विदेशी कपड़े त्यागने का आह्वान
उनके साथ उनके सहयोगी और प्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शांति लाल त्रिवेदी भी थे। गांधी जी ने इस स्थान पर एकत्र हुए लोगों से विदेशी कपड़े त्यागकर खुद के बनाए कपड़े पहनने का आह्वान किया।
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महात्मा गांधी की प्रेरणा से ही शांति लाल त्रिवेदी ने 1937 में यहां आकर गांधी आश्रम की स्थापना की। इसके लिए ग्रामीणों ने करीब 30 नाली जमीन दान में दी।
अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिला
शुरू में स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े लोग खादी के वस्त्र तैयार करके पूरे क्षेत्र में बांटते थे। इससे स्वरोजगार भी मिलता था। प्रारंभ में यहां कुछ चर्खे आदि ही लगाए गए थे लेकिन बाद में यहां कुछ अन्य मशीनें भी स्थापित कर दी गईं।
यह खादी और ऊनी वस्त्र तैयार करने वाली कुमाऊं की सबसे प्रमुख इकाई है। अभी यहां 120 कर्मचारी काम करते हैं। इसके अलावा करीब 500 लोगों को अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिला हुआ है। यहां शॉल, टोपी, थुलमा, स्वेटर, छुटका, कोट, जैकेट, मफलर, चादर, रजाई गद्दे आदि के अलावा ग्रामोद्योग के अंतर्गत बक्से, अलमारी आदि भी तैयार होते हैं।
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1998 तक गांधी आश्रम काफी मुनाफे में था
यहां तैयार हुआ सामान कुमाऊं के सभी जिलों के अलावा मांग होने पर बाहरी राज्यों में भी भेजा जाता है। गांधी आश्रम के व्यवस्थापक बलवंत सिंह फर्स्वाण ने बताया कि 1998 तक गांधी आश्रम काफी मुनाफे में था लेकिन पिछले कुछ वर्षों से यह घाटे में चल रहा है।
पिछले साल करीब 16 लाख रुपये घाटे में रहा। आर्थिक हालत ठीक नहीं होने से कुछ मशीनें टिनशेडों में लगाई गई हैं। यहां पानी भी टपकता है। मुख्य भवन भी जर्जर हालत में है। गांधी जी की इस विरासत का अस्तित्व बचाए रखने के लिए तत्काल आर्थिक मदद की दरकार है।
गांधीजी के नाम की संस्था के लिए भी झूठी घोषणाएं
महात्मा गांधी के नाम पर लंबे भाषण देने वाले जनप्रतिनिधियों ने चनौदा में स्थित महात्मा गांधी की इस विरासत को विकसित करने के लिए आज तक कोई प्रयास नहीं किए। सांसद और विधायक हर साल तमाम कार्यों के लिए सांसद - विधायक निधि से करोड़ों की राशि बांटते हैं लेकिन इस गांधी आश्रम को उन्होंने आज तक एक पैसा नहीं दिया है।