वन्य जीव तस्करों पर कार्रवाई के मामले में वन विभाग का रवैया हमेशा संदेह के घेरे में रहा है।
मुकदमों की पैरवी नहीं होने का मिला लाभ
समय पर कार्रवाई और मुकदमों की पैरवी नहीं होने का लाभ वन्य जीव तस्करों को हमेशा मिलता रहा है। यही हाल देश के कुख्यात वन्य जीव तस्कर संसार चंद के मामले भी रहा।
संसार पर केस दर्ज होने के बाद यदि जंगलात महकमे ने समय पर मुकदमों की पैरवी की होती तो वह जयपुर की जेल के बजाए उत्तराखंड की किसी जेल में कैद होता। उसके जेल में होने से कई वन्य जीवों की जान भी बच सकती थी।
जयपुर की जेल में बंद संसार चंद ब्रेन ट्यूमर की बीमारी से मंगलवार को मर गया लेकिन अपने पीछे कई सवाल छोड़ गया। संसार पर हरिद्वार में वर्ष 1995 में गुलदार की खाल की तस्करी के दो मुकदमे दर्ज हुए थे।
मामला दर्ज होने के करीब पांच साल बाद वर्ष 2000 में संसार चंद ने कोर्ट में सरेंडर किया और उसी दिन उसे जमानत मिल गई।
गवाहों की गवाही करवाने में लगे 13 साल
मामले में वन विभाग की लचर पैरवी का आलम यह रहा कि सीआरपीसी की धारा 244 के तहत छह गवाहों की गवाही करवाने में उसे 13 साल लग गए।
इसके बाद वन विभाग संसार चंद के खिलाफ सुबूत जुटाता रहा लेकिन यह प्रक्रिया इतनी धीमी चली की वर्ष 2013 तक वन विभाग गवाह ही पेश कर पाया। गवाही के बाद संसार चंद पर 2013 में आरोप तय हो पाए।
हालांकि वन विभाग का ढुलमुल रवैया आगे भी जारी रहा। आरोप तय होने के एक साल बाद भी वन विभाग सीआरपीसी की धारा 246 के तहत एक भी गवाह पेश नहीं कर पाया है।
यदि वन विभाग समय पर गवाह पेश किए होते और मामले पर ठीक से पैरवी की होती तो संसार चंद उत्तराखंड की किसी जेल में बंद होता।
अधिकतम तीन वर्ष लगते हैं जांच में
वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट के तहत किसी भी मामले में पकड़ने पर वन विभाग को अधिकतम तीन वर्ष में जांच पूरी करनी होती है। लेकिन संसार चंद के मामले में जांच के नाम पर ही 13 साल निकाल दिए गए।
नेटवर्क तोड़ना होगा
संसार चंद तो दुनिया से चला गया लेकिन उसके परिजनों और रिश्तेदारों का प्रदेश में बड़ा नेटवर्क काम कर रहा है।
पूर्व प्रमुख वन संरक्षक आरबीएस रावत का कहना है कि वन विभाग को इस नेटवर्क को तोड़ने के लिए विशेष दल गठित करना चाहिए। रावत बताते हैं कि बावरिया गिरोह से लेकर अमानगढ़ तक संसार का संसार फैला है।
वन विभाग के लिए व्यवहारिक दिक्कत यह है कि किसी भी मामले में साक्ष्य तलाशने के लिए जंगलों की खाक छाननी पड़ती है। चूंकि अदालत सबूत मांगती है, इसलिए मामले लंबे खिंच जाते हैं। संसार के मामले में भी ऐसा ही हुआ।
- आरबीएस रावत, पूर्व प्रमुख वन संरक्षक, उत्तराखंड
जिम कार्बेट की गुजरानी रेंज में 24 मई 2012 को बाघिन का शिकार किया गया था। उसकी फर्द बनाने में नौ माह लग गए। जनवरी 2013 में जाकर फर्द बन पाई। यह वन विभाग की लचर प्रक्रिया का अहम उदाहरण है।
- गौरी मौलेखी, सदस्य सचिव, पीएफए
पैसे देकर मरवाता था वन्य जीव
कुख्यात वन्य जीव तस्कर संसार चंद पैसे देकर वन्य जीवों को मरवाता था। इसकी जानकारी तब हुई जब वर्ष 2005 में राजस्थान के अलवर जिले में स्थित सरिस्का टाइगर रिजर्व में बाघों की गणना हुई।
गणना से पता चला कि यहां पर बाघ खत्म हो गए हैं। इसके बाद मामले की सीबीआई जांच हुई। पकड़े गए शिकारियों ने संसार चंद के लिए काम करने की बात स्वीकारी।
इसके बाद राजस्थान पुलिस ने दिल्ली में छापा मारकर संसार चंद के गोदाम से 35 गुलदार और दो बाघ की खाल बरामद की।
पहला केस 18 साल की उम्र में
18 साल की उम्र में संसार चंद के खिलाफ पहला मुकदमा वर्ष 1974 में दर्ज किया गया था। संसार चंद 200 से ज्यादा बाघ के अलावा हजारों अन्य वन्य जीवों की मौत का कारण बना है संसार चंद।
बाद में सीबीआई ने संसार की केस हिस्ट्री भी बनाई, जिसमें उसके कुकर्मों का चिट्ठा शामिल किया गया।
यदि समय पर वन विभाग ने गवाह पेश किए होते तो अभी तक कोर्ट अपना फैसला सुना चुका होता। केस को लंबा खिंचने में निश्चित तौर पर वन विभाग की लापरवाही रही। अन्यथा कोर्ट को सही वक्त पर गवाह और साक्ष्य मिलने पर फैसला जल्दी आ जाता है।
- संजीव शर्मा, वरिष्ठ अधिवक्ता