सरकार, ट्राली से कब तक झूलती रहेगी जिदंगी, पुल तो बना दो.. ये शब्द 65 वर्षीय विजय सिंह के हैं, जो अपने नाती को लेकर हर रोज जर्जर ट्राली से अगस्त्यमुनि और घर का सफर तय करते हैं। उनका यह सिलसिला दो साल से चल रहा है। यही हाल अन्य लोगों का भी है।
जून 2013 की आपदा के दो माह बाद शासन के निर्देश पर विजयनगर में मंदाकिनी नदी पर बहे झूला पुल के स्थान पर लोनिवि द्वारा ट्राली लगाई गई थी। इस ट्राली से क्षेत्र के चमराड़ा, चाका, गदनू, सिल्ला, झटग़ढ़, मरगट, तिमली सहित 36 ग्राम पंचायतों के ग्रामीण व 450 से अधिक स्कूली बच्चे प्रतिदिन ट्राली से आवाजाही करते हैं।
इन दिनों सुबह छह बजे और दोपहर एक बजे ट्राली पर स्कूली बच्चों की भीड़ देखी जा सकती है। बारिश हो चाहे चटक धूप ढाई साल से स्कूली बच्चे ऐसे ही जान हथेली पर रखकर घरों से स्कूल पहुंच रहे हैं।
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पुल के लिए बच्चे भी कर चुके हैं आंदोलन
ट्रॉली का इंतजार करते छात्र
- फोटो : AmarUjala
स्थायी पुल निर्माण संघर्ष समिति के अध्यक्ष नरेंद्र सिंह रावत का कहना है कि आपदा प्रभावितों की मदद का दावा करने वाली प्रदेश सरकार और प्रशासन नौनिहालों के साथ भी छलावा कर रहा है।
बच्चे जान हथेली पर रखकर पढने स्कूल जा रहे हैं। जब तक वे घर नहीं पहुंचते, मन बेचैन रहता है। जिला पंचायत सदस्य सुलोचना देवी कहती हैं धरना, आमरण अनशन के बाद भी सरकारी तंत्र की नींद नहीं टूट रही है।
नवंबर 2014 में विजयनगर में स्थायी पुल की मांग को लेकर स्कूली बच्चे भी धरना दे चुके हैं। इसके बावजूद शासन, प्रशासन की नींद तब भी नहीं टूटी।
ट्रॉली पर बैठने के लिए करना पड़ता है लंबा इंतजार
ट्रॉली से नदी पार करते छात्र (फाइल)
- फोटो : AmarUjala
जुलाई से ट्राली से स्कूल आने वाले कक्षा छह के छात्र नीरज का कहना है कि वह अपने गांव से सुबह 5:30 बजे घर से आ जाता हूं, जिससे मुझे 6:30 बजे तक ट्राली में बैठने को मिल जाए। इंटर की छात्रा अर्पिता, साक्षी, सोनम का कहना है दो वर्ष से वे इसी तरह घर से स्कूल और स्कूल से घर पहुंच रहे हैं।
पुलों के निर्माण में हो रही देरी गंभीर लापरवाही है। लोक निर्माण विभाग के सचिव को भी इस संबंध में दो पत्र भेजे जा चुके हैं। संबंधित अधिकारियों ने विजयनगर व चंद्रापुरी में इस वर्ष के अंत तक पुल निर्माण की बात कही है।
-डॉ. राघव लंगर, डीएम रुद्रप्रयाग