आपदा की बजाय कांग्रेस नेताओं का ध्यान 2014 के लोकसभा चुनाव पर है और इस कारण अधिकतर बड़े नेता अपने निर्वाचन क्षेत्रों तक सीमित हो गए हैं।
हाल यह है कि गढ़वाल सांसद सतपाल महाराज अपने क्षेत्र में तो हरिद्वार सांसद और केंद्रीय मंत्री हरीश रावत अपने क्षेत्र में उलझे हुए हैं। वहीं कुमाऊं के दोनों कांग्रेसी सांसदों को भी गढ़वाल की ओर रुख करने की फुर्सत नहीं है। इन कांग्रेसी सांसदों की बेरुखी का खामियाजा टिहरी और उत्तरकाशी को भुगतना पड़ रहा है। क्योंकि यह टिहरी संसदीय क्षेत्र का हिस्सा है और यहां से भाजपा की माला राज्य लक्ष्मी शाह सांसद हैं।
हरिद्वार की उपेक्षा का मुद्दा
केंद्रीय मंत्री रावत का पूरा ध्यान इस समय हरिद्वार संसदीय क्षेत्र पर हैं। हरीश रावत हरिद्वार की उपेक्षा का मुद्दा कई बार सरकार के सामने उठा भी चुके हैं। प्रदेश प्रभारी अंबिका सोनी के सामने तो उन्होंने यह तक कह दिया था कि उन्हें यहां से चुनाव लड़ना है तो लोगों को जवाब भी देना होगा। यही हाल महाराज का है।
महाराज के निर्वाचन क्षेत्र सबसे अधिक आपदा से प्रभावित है। रुद्रप्रयाग और चमोली के साथ ही महाराज रामनगर को लेकर भी सक्रिय हैं। वे लगातार सरकार को सुझाव भी दे रहे हैं। अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ में आई आपदा से निपटने के लिए सांसद प्रदीप टम्टा भी मुखर हैं।
वहीं नैनीताल और ऊधमसिंहनगर आपदा से कम प्रभावित है लिहाजा केसी सिंह बाबा अपेक्षाकृत कम मुखर है। पर इन सांसदों ने गढ़वाल की ओर शायद ही रुख किया हो और गढ़वाल संसदीय क्षेत्र के सांसद भी शायद ही कुमाऊं की ओर बढ़े हों।
टिहरी छोड़ सितारगंज को निर्वाचन क्षेत्र बनाया
ऐसे में टिहरी संसदीय क्षेत्र का हिस्सा उत्तरकाशी और टिहरी कि सी भी कांग्रेस सांसद की प्राथमिकता में नहीं है। जबकि हालत यह है कि पिछली बार की आपदा से पीड़ित उत्तरकाशी इस बार भी आपदा की मार झेल रहा है। टिहरी लोक सभा क्षेत्र से इस समय भाजपा की सांसद हैं और मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा टिहरी छोड़ सितारगंज को अपना निर्वाचन क्षेत्र बना चुके हैं।
उसके बाद से कांग्रेसियों को ध्यान उतर कम ही है। कांग्रेस से टिहरी लोक सभा उप चुनाव में प्रत्याशी रहे साकेत बहुगुणा ने भी टिहरी, उत्तरकाशी का दो-तीन बार ही दौरा किया।