कैथल। किसान अब पराली को खेतों में जलाने की बजाए उसे बेचकर अच्छी कमाई कर रहे हैं। किसान और ठेकेदार पराली को काटकर दूसरे प्रदेशों में भेज रहे हैं। वहां डेयरियों में इसका उपयोग पशु चारे के रूप में किया जाता है। यह कार्य ढांड, कलायत, सीवन, पूंडरी, गुहला-चीका लगभग पूरे जिले में किया जा रहा है। किसानों और ठेकेदारों द्वारा पराली को काटकर दिल्ली, राजस्थान, जयपुर और गन्नौर में सप्लाई किया जा रहा है।
चार लाख टन पराली निकली
कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डा. राजेंद्र सिंह श्योकंद से मिली जानकारी के अनुसार जिले में लगभग 155 हजार हेक्टेयर में धान की फसल होती है। इसमें से 125 हजार हेक्टेयर बासमती धान का क्षेत्र है। धान की इस फसल से प्रति हेक्टेयर 3.5 टन पराली निकलती है। जिले में धान की फसल से कुल 437500 टन पराली उत्पादित होती है और यह पराली 2500 रुपये प्रति हेक्टेयर के हिसाब से बिक रही है।
पर्यावरण को भी फायदा
पहले पराली को किसानों द्वारा खेतों में ही जला दिया जाता था, जिससे भारी मात्रा में धुआं उत्पन्न होता था, जो पर्यावरण को प्रदूषित करता था। अब किसानों द्वारा पराली को काटकर बेचने से पर्यावरण संबंधी समस्या का समाधान हो गया है। खेत में पराली न जलाए जाने से भूमि में जैविक कार्बन शक्ति बढ़ती है। साथ ही मित्र कीटों का भी संरक्षण हो जाता है। पशुओं के लिए चारे की उपलब्धता बढ़ जाती है।
आठ हजार लोगाें को रोजगार
पराली काट कर बेचने के इस कार्य से प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से तकरीबन आठ हजार लोगों को रोजगार मिला हुआ है। ये लोग खेतों से पराली ढोने, उसे काटने, वाहनों में भरकर दूसरे प्रदेशों में भेजने के कार्य में लगे हुए हैं।