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ऐसा सबक न सिखाएं

Una Updated Sat, 07 Dec 2013 05:44 AM IST
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संतोषगढ़ (ऊना)। पाठ याद न होने की स्थिति में सजा के तौर पर छात्राओं की चोटियों और छात्रों की टाई से जूते लटकाने को सजा को बुद्धिजीवी उचित नहीं मानते। उनका तर्क है कि सजा के और भी कई तरीके हैं। ऐसी सजा से बच्चों में भय पैदा होगा और बच्चे मानसिक परेशानी के दौर से भी गुजरेंगे। इस घटना को लेकर स्कूल प्रबंधन एवं संबंधित शिक्षिका के खिलाफ लोगों में भारी रोष है। ‘अमर उजाला’ ने ऐसी सजा को लेकर लोगों के बीच जाकर उनसे बातचीत करके उनकी राय जानी। लोगों का कहना था कि शिक्षक ऐसा सबक न सिखाएं
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प्यार से समझाएं बच्चों को
जिला परिषद उपाध्यक्ष अवतार सिंह ने कहा कि स्कू लों में बच्चों को ऐसी सजा नहीं दी जानी चाहिए। बच्चों को प्यार से समझाया जाना चाहिए, न कि उनको ऐसी सजा दी जाए।

बच्चों को मानसिक परेशानी
सेवानिवृत्त बीपीईओ चमन लाल साहनी का कहना है कि ऐसी सजा देने से बच्चों में भय का वातावरण पैदा होता है और बच्चे मानसिक परेशानी के दौर से भी गुजरते हैं।
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1098 नंबर दर्शाना सही
ऊना के कारोबारी तरसेम शर्मा ने कहा कि ऐसी सजा दिया जाना किसी भी सूरत में उचित नहीं है। स्कूलाें में 1098 नंबर दर्शाने का निर्णय सही है। इससे ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति भी रुकेगी।

पहले अभिभावकों सूचित करते
मंडी समिति के पूर्व अध्यक्ष विजय चब्बा कहते हैं कि बच्चों के टाई एवं चोटियों से जूते लटकाना सही नहीं है। अगर बच्चा पढ़ाई में कमजोर है या कोई शरारत करता है तो इसकी सूचना सबसे पहले अभिभावकों को दी जानी चाहिए।

शर्मनाक है घटना
कारोबारी वरिंद्र सरीन ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा को लेकर सरकारें कई नियम बना रही हैं। टीवी पर कई सीरियल चल रहे हैं, जिनके माध्यम से बच्चों की सुरक्षा को लेकर बताया जाता है। स्कूल में ऐसी घटना शर्मनाक है।

अच्छे संस्कार भरें
सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य रविंद्र नाथ पाठक ने कहा कि शिक्षक वर्ग का फर्ज बनता है कि वे बच्चों में अच्छे संस्कार भरें। ऐसी घटना को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। बच्चों में असुरक्षा की भावना पैदा न हो।
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