केंद्रीय कानून व न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की सरकारी नियुक्तियों से पहले अनिवार्य कूलिंग-ऑफ पीरियड लागू करने की मांग को खारिज किया। उन्होंने कहा है कि अगर कोई व्यक्ति मानसिक रूप से स्वस्थ, निष्पक्ष और सक्षम है तो उसे काम करने से रोकने का कोई कारण नहीं है। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका के भीतर भी इस मुद्दे पर अलग-अलग राय हैं और इस पर कोई सर्वसम्मत दृष्टिकोण नहीं है।
कूलिंग-ऑफ पीरियड वह निर्धारित समय होता है, जिसके दौरान किसी व्यक्ति को अपने पद से रिटायर होने या इस्तीफा देने के बाद तुरंत किसी नई सरकारी, निजी या संवैधानिक नियुक्ति लेने की अनुमति नहीं होती।
जजों की नियुक्तियों पर क्या बोले?
पीटीआई को दिए एक साक्षात्कार में मेघवाल ने कहा कि कुछ लोग मानते हैं कि सेवानिवृत्त जजों की नियुक्ति में जल्दबाजी नहीं होनी चाहिए, जबकि कुछ का मानना है कि नियुक्तियों में देरी भी नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि देश में विभिन्न न्यायाधिकरणों में बड़ी संख्या में पद खाली हैं और अनुभवी लोगों की आवश्यकता है।
न्यायाधिकरण में ऐसे लोगों की जरूरत है
कानून मंत्री ने कहा कि राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण और राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण जैसे न्यायाधिकरणों में योग्य और अनुभवी न्यायाधीशों की जरूरत है। उन्होंने सवाल किया कि अगर कोई सेवानिवृत्त जज न्यायसंगत सोच रखने वाला, स्वस्थ और सक्षम है तो उसकी नियुक्ति तुरंत करने में क्या समस्या है।
लंबे समय से किस बात पर बहस चल रही?
रिटायरमेंट के बाद न्यायाधीशों को विभिन्न सरकारी संस्थाओं में नियुक्त किए जाने को लेकर लंबे समय से बहस चल रही है। आलोचकों का तर्क है कि ऐसी नियुक्तियां न्यायिक स्वतंत्रता और हितों के टकराव को लेकर सवाल खड़े कर सकती हैं। सेवानिवृत्त जजों की नियुक्ति राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, लोकपाल, भारतीय विधि आयोग और भारतीय प्रेस परिषद जैसी संस्थाओं में भी की जाती है।
कूलिंग-ऑफ पीरियड की मांग किस धारणा पर आधारित होती है?
मेघवाल ने कहा कि कूलिंग-ऑफ पीरियड की मांग अक्सर इस धारणा पर आधारित होती है कि किसी जज को उसके फैसलों के बदले पद दिया जा सकता है, लेकिन ऐसा मानना गलत है। उन्होंने कहा कि नियुक्तियां किसी विशेष फैसले के आधार पर नहीं की जातीं और इस तरह की आशंकाओं को राजनीतिक रंग दिया जाता है।
मेघवाल ने किन बातों को स्पष्ट किया?
उन्होंने स्पष्ट किया कि जिन न्यायाधीशों का सेवा रिकॉर्ड अच्छा नहीं रहा है, उन्हें नियुक्त करने का कोई औचित्य नहीं है। हालांकि, सक्षम और प्रतिष्ठित जजों पर किसी प्रकार की पाबंदी नहीं होनी चाहिए। मंत्री ने कहा कि कई बार सेवानिवृत्त न्यायाधीश खुद भी नई नियुक्तियां स्वीकार नहीं करते और मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) का काम करना पसंद करते हैं, जिसे अधिक लाभदायक माना जाता है।
मेघवाल ने बताया कि देश में कुल 21 न्यायाधिकरण हैं और उनमें कई पद अभी भी खाली पड़े हैं। सरकार सेवानिवृत्त जजों को इन पदों पर सेवा देने के लिए आमंत्रित करती है, लेकिन कई न्यायाधीश आर्बिट्रेशन कार्य को प्राथमिकता देते हैं।
उन्होंने यह भी दोहराया कि संविधान में न्यायाधीशों के लिए सेवानिवृत्ति के बाद किसी अनिवार्य कूलिंग-ऑफ पीरियड का प्रावधान नहीं है। केंद्र सरकार पहले भी संसद में यह स्पष्ट कर चुकी है कि ऐसी नियुक्तियों का कोई केंद्रीकृत रिकॉर्ड नहीं रखा जाता, क्योंकि केंद्र, राज्य और केंद्रशासित प्रदेश अपने-अपने ढांचे के तहत नियुक्तियां करते हैं।
वेतन और भत्तों में संशोधन को लेकर क्या बोले?
वहीं, भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा न्यायाधीशों के वेतन और भत्तों में संशोधन संबंधी पत्र के सवाल पर मेघवाल ने कहा कि फिलहाल सरकार के विचाराधीन मुद्दा वेतन नहीं, बल्कि न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति आयु से जुड़ा है। उन्होंने कहा कि अगर इस संबंध में कोई अन्य पत्र प्राप्त हुआ है तो सरकार उस पर विचार करेगी।