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Supreme Court: एमपी सड़क विकास निगम को कड़ी फटकार, 23 साल पुराने मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश में क्या?

पीटीआई, नई दिल्ली। Published by: Jyoti Bhaskar Updated Fri, 29 May 2026 08:56 PM IST

सार

मध्य प्रदेश से जुड़े एक मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट ने आज अहम आदेश पारित किया। अदालत ने मध्य प्रदेश सड़क विकास निगम को फटकार लगाते हुए मध्यस्थता के बाद अवॉर्ड के निर्णय को सही ठहराया। करीब 23 साल पुराने विवाद में दो जजों की खंडपीठ ने क्या कहा? जानिए क्या है पूरा मामला
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सुप्रीम कोर्ट ने एमपीआरडीसी को फटकार लगाई - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश सड़क डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड (MPRDC) की अपील खारिज कर दी है। कोर्ट ने मेसर्स जबलपुर कॉरिडोर प्राइवेट लिमिटेड (JCPL) के पक्ष में दिए गए मध्यस्थता अवॉर्ड को बरकरार रखा। शीर्ष अदालत ने MPRDC के आचरण को 'निंदनीय' बताया। कोर्ट ने कहा कि भारत में मध्यस्थता विफल नहीं हुई, बल्कि कभी-कभी अदालतें विफल हुई हैं।

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अगस्त 2014 से 2016 के बीच मध्यस्थता, अवॉर्ड पर हाईकोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस जेके माहेश्वरी और अतुल एस चंदुरकर की पीठ MPRDC की अपील पर सुनवाई कर रही थी। यह अपील मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के दिसंबर 2016 के आदेश के खिलाफ थी। हाई कोर्ट ने भोपाल जिला अदालत के उस आदेश को बरकरार रखा। हाईकोर्ट ने JCPL के पक्ष में आदेश पारित करते हुए अगस्त 2014 में हुई मध्यस्थता के बाद अवॉर्ड के आदेश को रद्द नहीं किया था।

क्या है पूरा मामला
दरअसल, करीब 23 साल पुराना यह मामला वर्ष 2003 के एक विवाद से जुड़ा है। तब MPRDC ने JCPL के साथ 176 किलोमीटर लंबी सागर-दमोह-जबलपुर सड़क परियोजना के लिए समझौता किया था। यह परियोजना 'बिल्ड-ऑपरेट-ट्रांसफर' (BOT) आधार पर थी। राज्य सरकार द्वारा निर्माण के लिए खाली जमीन न देने पर परियोजना रुक गई। MPRDC ने 2007 में अनुबंध समाप्त कर दिया था। JCPL ने 2011 में मध्यस्थता प्रक्रिया शुरू की थी।
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कोर्ट के फैसले में क्या?
शीर्ष अदालत ने अपने आदेश में कहा कि अपीलकर्ता पर संविदात्मक और वैधानिक ब्याज दर लगाने में हस्तक्षेप का कोई कारण नहीं है। यह पूरी तरह से न्यायसंगत और उचित है। अपील खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट की रजिस्ट्री को निर्देश दिया। रजिस्ट्री को दो सप्ताह के भीतर JCPL को जमा राशि और अर्जित ब्याज जारी करना होगा। MPRDC को शेष राशि और अर्जित ब्याज का भुगतान तीन महीने के भीतर करने का भी निर्देश दिया गया।

मध्यस्थता पर टिप्पणी क्या?
सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि 'भारत में मध्यस्थता विफल नहीं हुई है; हालांकि, कभी-कभी अदालतें भारत में मध्यस्थता को विफल कर देती हैं।' सरकार की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि मध्यस्थता के क्षेत्र में एक भी संदिग्ध मिसाल भारत में इसकी व्यवहार्यता पर असर डाल सकती है। यह भारत में व्यापार करने में आसानी पर भी प्रभाव डालती है। न्यायिक हस्तक्षेप अक्सर भारत में बिना बीमारी के इलाज जैसा रहा है।

MPRDC के आचरण पर फटकार
शीर्ष अदालत ने MPRDC के आचरण को 'निंदनीय' बताया। MPRDC ने संविदात्मक बकाया के भुगतान में देरी के लिए हर संभव प्रयास किया। कोर्ट ने कहा कि परियोजना समाप्त होने के बाद अवॉर्ड को फलित होने में 19 साल लग गए। इस मामले में विवाद समाधान तंत्र की गति इस बात का प्रमाण है कि 'देर से मिला न्याय, न्याय न मिलने के बराबर है'। JCPL द्वारा दायर एक अंतरिम आवेदन में बताया गया कि मलयेशियाई उच्चायोग और भारत सरकार के विदेश मंत्रालय के बीच राजनयिक आदान-प्रदान भी हुए थे। यह इस मुद्दे के विलंबित निर्णय के संबंध में था।

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