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भीख में मिले पैसों से खोद डाला तालाब

नीरज सिन्हा/ राँची से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए Updated Sat, 21 May 2016 11:16 AM IST
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पाई-पाई जोड़कर जुटाई तालाब खोदने की रकम - फोटो : नीरज सिन्हा
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"भीख में आठ आने, एक रुपए के लिए हम दोनों पहर रिरियाते हैं। तुरंत 200 रुपए तालाब के लिए चंदा देना मुश्किल काम था इसलिए कई लोग पांच-दस रुपए करके रोज कमेटी के पास जमा करते रहे।"
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चंचला देवी की ही तरह रांची के पास रहने वाले कुष्ठ रोगियों ने भीख से जुटाए पैसों से तालाब के जीर्णोद्धार का काम शुरू किया है।

देश के कई गाँवों-शहरों की तरह यहाँ भी इस बार पानी की कमी लोगों को झेलनी पड़ रही है।

इन कुष्ठ रोगियों ने अपनी समस्या का हल खुद निकालने का जिम्मा उठाया है। लॉरेंस की आंखों में रोशनी नहीं, लेकिन कदम-कदम पर पत्नी प्यारी का साथ है। जिंदगी की दुश्वारियों के सवाल पर इस कुष्ठ पीड़ित दंपती के चेहरे पर मुस्कराहट तैर जाती है।

दोनों लगभग एक साथ कहते है, "कुदरत ने काया नहीं दिया, ठहरे अपढ़ और भीखमंगे। ये जतन नहीं करते, तो फिर बड़ी विपदा से हमें कौन बचाता।"

उन्होंने कहा, "पानी की किल्लत के बीच भीख के पैसे से हमने तालाब के जीर्णोद्धार की कोशिशें शुरू की हैं। 200-200 रुपए सबने जमा किए हैं, आगे भी देने पड़ सकते है।"
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यहां रहने वाले दो सौ से अधिक परिवारों की आंखों में इन दिनों एक ही फिक्र है, बस्ती के तालाब को गहरा और चौड़ा करना, ताकि इसमें बारिश का ढेर सारा पानी जमा हो जाए।

जो काम सरकार को करना चाहिए, इन लोगों ने कर दिया

रंग लाएगी कुष्ठ रोगियों की अनूठी पहल - फोटो : नीरज सिन्हा
कुष्ठ परिवारों ने अब तक आपस में चंदा कर करीब 65 हजार रुपए जमा किए हैं। बस्ती के मुखिया मुरारी गोस्वामी बताते हैं, "चैत महीने में ही तालाब जब सूखकर फट पड़ा, तो हमारी बेबसी बढ़ती गई। इक्का-दुक्का कुओं से बड़ी आबादी का काम नहीं चलता। फिर हमारी कमेटी बैठी और तय हुआ कि सभी परिवार दो-दो सौ रुपए जमा करें और देर किए बिना शुरू हुआ सामूहिक अभियान।"

हर शाम भीख से मिले पैसों में कुछ निकालना, कठिन लगता होगा, इस सवाल पर चंचला देवी कहती हैं, "का करेगा बाबा, जिंदगी की बेबसी भी तो कम नहीं।"

बस्ती की ही सीमा बताती हैं कि तालाब का इस्तेमाल तो दूसरे लोग भी करते हैं, पर हम कहां और किनसे सहायता की मांग करते। डर इसका भी कि झिड़कियां न सुननी पड़ें।

बस्ती के बड़े-बुजुर्ग और बच्चों ने एक साथ श्रमदान भी किया। पसीने से तर-ब-तर रमण बताते हैं, "हम कुष्ठ पीड़ितों के हाथ-पांव भी तो इस काबिल नहीं कि सारा बोझ उठा लें। फिर भी इन मुश्किलों से निकलने का जुनून है। तभी तो किनारे से साढ़े सात फीट तक कटाई का काम पूरा हो गया है। हफ्ते भर बारिश ठहर ही जाए, तो अच्छा।"

कुष्ठ पीड़ितों की सूखे से जंग

गांव में पानी के लिए कोई नहीं मनाता छुआछूत - फोटो : नीरज सिन्हा
कुष्ठ परिवारों की इस बस्ती में नई स्वस्थ पीढ़ी भी तैयार हो रही है। जयसिंह बताते हैं कि कई परिवारों के बाल-बच्चे स्वस्थ हैं और वे पढ़ते-कमाते भी हैं। लिहाजा ये लोग अपने घर वालों की परेशानी कम करने की हरसंभव मदद कर रहे हैं।

सार्वजनिक तौर पर इस्तेमाल होने वाले इस तालाब में कुष्ठ परिवारों के जाने पर दूसरे लोग आपत्ति नहीं जताते।

बीए में पढ़ने वाले राकेश कुमार तालाब के ऊपरी छोर पर पुआल की दुकान चलाते हैं। वे कहते हैं, "छुआछूत जैसी कोई बात नहीं है। क्या यह कम है कि कुष्ठ परिवारों ने भीख में मिले हजारों रुपए इकट्ठे खर्च कर तालाब बचाने की कवायद की।"
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