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शहर का सहर

नृपेन्द्र अभिषेक

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब मैं सहर में
        
                                                    
                            
शहर की शहराती को
देखता हूँ तो
उनकी चिर निद्रा देख
मुझे गांवो के सहरा
स्मरण होते हैं
जहाँ सहर के पहले ही
लोग निकल पड़ते है
सहरा में सैर करने
देखता हूँ वहाँ की
मृत्तिका की सुवास को
जो शहर के चमकीले मृण से
कहीं ज्यादा सुरभित है
शहर की चकाचौंध से
निर्गमित मालिन्य वातों से
बेहद खुशनुमा होती है
गांवो की मरुत ।
शहरों में लोगों को
फुरसत कहाँ होती है
एक दूसरे के हालात जानने की
गांवो में रोज ही सब
साथ में चौपाल लगाते हैं
एक दूसरे के हर दुसाध्य में
सहचार निभाते हैं।
गांवों की सामाजिक बनावट
कभी शहरों में कहाँ
नसीब होती है
शहरों में एक- दूसरे से आगे
निकलने की होड़ में
सब पीछे ही छूटते जाते हैं।
शहरों के आशियानों में
सामाजिकता के नाम पर
मिलते हैं तो बस अनाथालय
गांवो में पनपे बड़ों के स्नेह को
शहरों में पहले उस पर
धूल की मोटी परत जमाई जाती है
फिर कालिख हो जाने पर
आधुनिकता बताई जाती है।
शहर के फ्लैटों में
जिंदगी की दौड़ में
हम कितने आगे आ गए हैं
जहाँ से हमें अब
अपनत्व नजर नहीं आता
गांवो में बैठी माँ हो या फिर
खेतों में काम करते पिता
उनके लिए अब कहाँ
प्यार दिखता है किसी शहराती में
बचपन में कन्धे पर घुमाने वाले
चाचा भी नहीं दिखते
और नहीं दिखता चाची का प्यार
बचपन के दोस्त भी
नहीं दिखते शहरों में
शहर आते ही रिश्ते नाते
सब टूट कर बिखर गए
सुबह से शाम में जिंदगी
बंध सी गई है अब
बस काम, पैसा और शोहरत  में
गांवो की प्रीत खो सी गई है
इन दौड़ते भागते शहरों में
बाकी सब कुछ है लेकिन सुकून नहीं ।

-- नृपेन्द्र अभिषेक नृप
छपरा , बिहार
3 वर्ष पहले
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