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चिंता

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                            चिंता चिंतित करती है
        
                                                    
                            
पढ़े - लिखे , सयाने को
अनपढ़ , नासमझ ,
बूढ़े , दीवाने को

और लूटती जाती है
बचपने , बुढ़ापे और जवानी को
और इठलाती हुई त्योरियां चढ़ाकर
भले - चंगे की त्योरियां चढ़ा देती है

गुरुर करती हुई
मौज , मस्ती , आनंद
चुरा ले जाती है चतुराईन !
और दिखाती है
अपना विराट रूप चिता

सबकुछ छीनकर
चिता देती है
बहुत बड़ी दानी बनकर
और खुद को सौंपती है
दासी बनकर

और धीमे - धीमे दहकती है
ये चिंता चित्त की चेतना तक
हर लेती है ।

- आदित्य वर्मा
3 वर्ष पहले
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