चिंता चिंतित करती है
पढ़े - लिखे , सयाने को
अनपढ़ , नासमझ ,
बूढ़े , दीवाने को
और लूटती जाती है
बचपने , बुढ़ापे और जवानी को
और इठलाती हुई त्योरियां चढ़ाकर
भले - चंगे की त्योरियां चढ़ा देती है
गुरुर करती हुई
मौज , मस्ती , आनंद
चुरा ले जाती है चतुराईन !
और दिखाती है
अपना विराट रूप चिता
सबकुछ छीनकर
चिता देती है
बहुत बड़ी दानी बनकर
और खुद को सौंपती है
दासी बनकर
और धीमे - धीमे दहकती है
ये चिंता चित्त की चेतना तक
हर लेती है ।
- आदित्य वर्मा