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हम मजदूर हैं

Abhash Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हम मजदूर हैं,
        
                                                    
                            
जंगल के फूल हैं,
निग़ाहों में किसी की
हमारी खूबसूरती समा नही पाती,

महलों के सीसे बड़े मोटे परतदार हैं,
हमारी चींखें अंदर तक पहुँच नही पाती,
हमारे चेहरे का रंग,
कैमरा के कॉन्ट्रास्ट से मैच नही कर पाता है,

किसी को हमारी तस्वीर मोहक नही लगती,
हमें जंगल से बाहर कभी लाया नही जाता है,

हम झर जाते हैं मर जाते हैं,
डालियों के सीने से चिपके,
चार बूंद पानी की आश में,
दो रोटी आने के इंतज़ार में,

हम अक्सर अपनी मौत से नही मरते,
हमें मार दिया जाता है,
बिना किसी को गुनाहगार ठहराये,

हम ऐसे ही मर जाते हैं बस,
अपनी उम्र से तो नही ही मरते हैं शायद
हम मरते हैं कभी कारख़ानों में आग लगने से,
कभी गैस रिस जाने से,
कभी पैदल चलते रहने से,
तो कभी ट्रैन के गुजरने से,

हम मर जाते हैं,
हम बस ऐसे ही मर जाते हैं।

__ आभाष कुमार सौरभ

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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5 वर्ष पहले
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