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नाराज़ इश्क़

Abhishek Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            वो खफा हमसे,
        
                                                    
                            
हम खफा उनसे,
पर गुफ्तगू करने को जी चाहता है।

वो दूर हमसे,
हम दूर उनसे,
पर दीदार करने को जी चाहता है।

वो दर्द में हमारे,
हम दर्द में उनके,
पर मलहम लगाने को जी चाहता है।

वो बोलें ना हमसे,
हम बोलें ना उनसे,
पर उन्हें सुनने को जी चाहता है।

वो मिलें ना हमसे,
हम मिलें ना उनसे,
पर साथ चलने को जी चाहता है।

वो आसरे ना हमारे,
हम आसरे ना उनके,
पर इंतजार करने को जी चाहता है।

वो गुज़रे ना इधर से,
हम गुज़रे ना उधर से,
पर निगाहें बिछाने को जी चाहता है।

वो कम ना हमसे,
हम कम ना उनसे,
पर इकरार करने को जी चाहता है।

वो खुश रहें जिनसे,
हम खुश रहें उनसे,
यह दुआ करने को जी चाहता है।

- अभिषेक कुमार "चित्रांश"

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले
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