संभालो दीये को, मौसम बड़ा सुहाना है,
दीया बुझ जाए, ऐसा है पवन सारा।
लोग कहते है, अंधेरा उन्हीं से है,
जिन चिरागों के नीचे है, ज़माना सारा।
अब क्या बताएं, इन वक्त के नादानों को,
जो छूपा कर रख्खा है, अंधेरा वहीं है खजाना सारा।
दरख्वास्त मत करो, इन शमा के परवानों से,
जो बैठे हैं बेचने यहां, ये चमन सारा।
आए है मजलिस में, वफ़ा की तसल्ली बनकर,
देखा नहीं है ऐसा, कहीं दुश्मनों का पतन सारा।
दिल के शामियाने में, लगाकर शोलो की आग,
लेकर तूफ़ान से भरा, फड़फड़ाता जीवन सारा।
जो रूठे थे मेरी, मंजिल-ए-रफ़्तार की जलन से
आज लाएं हैं वहीं, रूखसत का कफ़न सारा।
- अकबर पिंजारी, कोपर्ली, नंदूरबार, महाराष्ट्र
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