कोई दोष नहीं, फिर रोगी क्यूँ है
शांत हृदय भी, क्षोभी (व्याकुल) क्यूँ है
बातों से बहती निर्मलता, फिर
मन, इतना तू लोभी क्यूँ है
आदिकाल के डाकू भी,
बन जाते थे साधू जी
वो रखते थे खुद पर,
कैसे इतना काबू जी
हृदय में बसते थे ईश्वर
अब मठ में मिल जाते हैं
भांति भांति के मठों मे,
अब भक्त छाले जाते हैं
देखो कैसे देवता,
मठ मठ में पाले जाते हैं
बनकर कैसे बाबा जी,
सब कुछ भोगे जाते हैं
फिर, भगवा में जोगी क्यूँ है
मन, इतना तू लोभी क्यूँ है
संबंधो का मान कहाँ
रिश्तों में अभिमान कहाँ
जख्मों के भर दे घाव यहाँ
मन के ऐसे भाव कहाँ
वहम की ऐसी गांठी है
परिवर्तन की आंधी है
बाजारवाद की थापी है
धन की आपा धापी है
संबंध अगर हैं टिके हुए
उद्देश्य अभी कुछ बाकी है
इंसा इतना ढोंगी क्यूँ है
मन, इतना तू लोभी क्यूँ है
अमित...