अपनी ममता छांव में जिसने दुनिया संभाला है,
उस ममता को सत नमन जिसने सबको पाला है।
क्यों कोसते उस मां की ममता, जिस मां ने तुमको जन्म दिया,
जीवन के हर एक गलती को मरते दम तक वहन किया।
कभी सताते अपनी बोल से किंचित हाथ चलाते हो,
निर्ममता से भी परे अपनी स्वर उठाते हो।
जिस मन में निस्वार्थ, निश्छल, निर्मल प्रेम समाई है,
उस मन को तुम्हें कुंठित करते क्षणिक दया न आई है।
विचारो की जलधारा से जिसने श्रेष्ठ बनाया है,
रौंद उसे पैरो तले अपनी अमन शांति मिटाया है।
जिसने तुमको सींचा अपनी दया के सागर से,
अनदेखा कर हर भूल तुम्हारी सींचा प्रेम रूपी गागर से।
अर्जुन मौर्य