किस बात पर इतना
तू इतराता है गुलाब
बनकर गुलों का राजा
दिन में देखता है ख्वाब
खूबसूरत पंखुड़ी तेरी
प्रकृति की देन तुझको
फिज़ा में सुगंध फैली
हवाओं की मेहरबानी
इतरा तू मत इतना
अपने सुर्ख रंग पर
रक्तिम यह वर्ण तेरा
शोषण की दास्तान
जड़ों ने तेरी छीना
संचित धन धरा का
कांटें चुभो कर तूने
मासूमों का लहू चूसा
शोषण कर धरा का
क्युं तू मुस्करा रहा
काल के हाथ निष्ठुर
मसलेंगें ये पंखुड़ियां
सुन्दर रुप एक दिन
मिल जाएगा धरा में
रह जाएगी कहानी
शोषण की जहां में
कांटे चुभोकर बेवजह
मुंह फेरकर हंस देना
शोषण कर मुस्कुराके
हौले से व्यंग करना
शोषण करें अपनों का
मानव की सब ये आदत
सोहबत का असर तुझपे
सीखा सब आदमी से
सोहबत में आदमी के
अब तू भी बदल गया
बेदर्द आदमी सा
खुदगर्ज बन गया
- अशोक श्रीवास्तव
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