विज्ञापन

परम दया कर

Avatar singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            परम दया कर प्राण भेदना,
        
                                                    
                            
प्रकट हो रही जन-जन की वेदना।
दैन्य भाव इंगित करते सकल जन,
क्रुंदन विषण्ण नाद मौन हृदय मन,
मंद्रित नीरव अपलक जन चितवन।
स्पंदित करते जन के ध्वस्त भाव,
दृग विकल आवेग शून्य देख काल।
शान्त समीर सजग करती वसुंधरा,
सतत वदान्यता प्रकट करता परम पिता।
ये चिंगारी ज्वाला की सृजन है,
जो प्राणहर्ता का मात्र एक गर्जन है।
 
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
5 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all