परम दया कर प्राण भेदना,
प्रकट हो रही जन-जन की वेदना।
दैन्य भाव इंगित करते सकल जन,
क्रुंदन विषण्ण नाद मौन हृदय मन,
मंद्रित नीरव अपलक जन चितवन।
स्पंदित करते जन के ध्वस्त भाव,
दृग विकल आवेग शून्य देख काल।
शान्त समीर सजग करती वसुंधरा,
सतत वदान्यता प्रकट करता परम पिता।
ये चिंगारी ज्वाला की सृजन है,
जो प्राणहर्ता का मात्र एक गर्जन है।
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