हार के बाद ही तो होते उजाले,
जीत की रौशनी पथ को दिखती।
घोर निराशा के भँवर में सो कर,
उम्मीदों की नव किरणें जगती।
दुःख के तपोवन से निकले तो,
खुशियाँ छोटी भी बड़ी दिखती।
तूफा से टकराकर बढ़े जो आगे,
कश्तियाँ वो किनारे लगती।
हाल बेहाल,बेख़ुद पथिक हो तो,
मंज़िले उसे खुद खोजती।
रात अँधेरी कितनी भी हो,
सूरज को आगे से नही रोकती।
मीनाक्षी
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