ख़्वाब ही कुछ ऐसा था जो अधूरी रह गयी
गिरेबान में झाँका नहीं जो दूरी रह गयी।
खामख्वाह परेशान होते रहे जिंदगी भर
मृग की तरह ढ़ूंढता रहा पास कस्तूरी रह गयी।
अंह करना मेरे लिए यह भारी पड़ गया
जिंदगी भर के लिए ही जी हुजूरी रह गयी।
नदानियों की असर समझ में आने लगी अब
ना जाने समझ में कैसी मजबूरी रह गयी।
बैखौफ रहा जमाने से जिंदगी निकलती रही
जान नहीं पाये अंत में यह झिंगूरी रह गयी।
हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें