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ख़्वाब

Bindu Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ख़्वाब ही कुछ ऐसा था जो अधूरी रह गयी
        
                                                    
                            
गिरेबान में झाँका नहीं जो दूरी रह गयी।

खामख्वाह परेशान होते रहे जिंदगी भर
मृग की तरह ढ़ूंढता रहा पास कस्तूरी रह गयी।

अंह करना मेरे लिए यह भारी पड़ गया
जिंदगी भर के लिए ही जी हुजूरी रह गयी।

नदानियों की असर समझ में आने लगी अब
ना जाने समझ में कैसी मजबूरी रह गयी।

बैखौफ रहा जमाने से जिंदगी निकलती रही
जान नहीं पाये अंत में यह झिंगूरी रह गयी।


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7 वर्ष पहले
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