दो कप चाय,
आज भी वही ठहरी हुई हैं जिंदगी
जो तुमने बनाई थी सबके लिए
और बचाई थी
दो कप
एक अपने लिए
एक हमारे लिए
हमने साथ पी थी वो चाय
आज भी लम्हे वही ठहरे हुए हैं
और आज भी मैं दो कप चाय पीती हूँ
एक तुम्हारे लिए एक अपने लिये
तुम्हारी याद में
आज भी वो सोंधी महक
महसूस करती हूँ
उबलने की आबाज आज भी सुनाई देती हैं
आज भी मेरा लम्हा वही ठहरा हुआ हैं
आज भी वही अहसास होता हैं
की तुम मेरे पास हो
और साथ मे हैं दो कप चाय
- विनीता शाहा