चल रहा हूँ राहों में,
एक मुसाफिर की तरह
राह सुनी है मगर
मेरे इरादे सुने हैं नहीं
जब तक चलूंगा पथ पर
हार में मानूँगा नहीं
वृक्षों की कहीं छांव है
तो कहीं पत्थर शूल भी
पर कठिनाइयों को देखकर
मैं डरने वाला नहीं
क्वार की धूप है तो
कहीं पूस की रात भी
चलता रहूँगा जब तक
मंजिल की शुरुवात नहीं
राह की ठोकरों में
कहीं अगर मैं गिर गया
तो शक्ति को एकत्र करके
पुनः फिर मैं उठ गया
सामने शिखर है तो
मैं मुड़ने वाला नहीं
कदम तब तक रुके नहीं
शिखर चढ़ जाता नहीं
कर्म से में ना हटूं
यों ही नित्य आगे बढूं
अंत की क्यों सोच लूं
जब वर्तमान में जियूँ
लड़ाई मेरी तुझसे नहीं
ये लड़ाई मेरी खुद से है
अगर राह अनंत है तो
में भी कुछ कम नहीं
चलता रहूँगा जब तक
मैं मिट जाता नहीं
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें