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बेवफ़ा न होती

Er Mohd

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ऊंचे ऊंचे पहाड़ों वादियों पर ,
        
                                                    
                            
कभी भी फिज़ा नहीं होती ।
बेगैरत हकीमों के हाथों में ,
कभी भी शिफा नहीं होती ।।

ए कौम ए आदम अगर तुमने,
अपने माज़ी में की गलतियों से सीखा होता ।
तो आज ज़माने भर में यूं ,
इस तरह से कभी भी बवा नहीं होती ।।

ये मोहब्बत वो जुर्म है जिसे ,
हर फर्द ने किया हुआ है ।
बता दूं इस जुर्म ए मुहब्बत की ,
कभी भी सज़ा नहीं होती ।।

अगर तुमने पहले से ही ,
अपने महबूब पर नज़र रखी होती ।
तो महबूब तुम्हारी यूं मशहूर ,
ज़माने में कभी भी बेहया न होती ।।

गर उसके ख्यालों से हटकर ,
तुम भी जल्दी रात में सोए होते ।
तो यूं ही हर रोज सुबह ,
फज्र तुम्हारी कभी भी क़जा न होती ।।

अगर तुम हमारे हमवतन न होते ,
आज अनजान इस परदेस में ।
तो इस क़दर बेवजह हमे तुमसे ,
यूं कभी भी वफ़ा न होती ।।

नासमझ जानते भी हो ,
जिस सरजमीं के लिए तुम ये बदकलामी कर रहे हो ।
ये वो सरजमीं है ईशान ,
जहां की फाएशा तक कभी भी बेवफ़ा नहीं होती ।।

ई० मो० ईशान अंसारी محمد ایشان انصاری ✍🏻
moeeshan209725@gmail.com

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3 वर्ष पहले
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