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खिलते फूल

Garima Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जरा अदब से छूना तुम है बीज शहादत दे देता
        
                                                    
                            
खातिर मेरे बरजे पर खिल जाये गुड़हल फूल।।
खिलता ये संग सूरज के रात जरा उनींदा हो
बन्द कर नयन कपोलें सो जाता गुड़हल फूल।।
रात ये जाये दिन कब हो खिल जाऊं फिर से
बाट जोहता ऐसे ही सूरज का गुड़हल फूल।।
सुबह खिले,शाम ढले जब तक थोड़ी जान रहे
किसी रोज फिर मिट्टी में मिल जाये गुड़हल फूल।।
चले बात जब रंग बिरंगे रिश्तों के एहसासों की
हर रिश्ते में नया रंग ले आता गुलाब का फूल।।
रंग सफेद निर्मलता का और पीला मित्रता बढ़ाये
कभी प्यार औ नफरत भी दर्शाता गुलाब का फूल।।
रहता संग शूलों के फिर भी खिलता ये मुस्काता है
है इसी अदा से सबको ही भाता गुलाब का फूल।।
और ये शिवप्रिय शुभ्र दूध के फेन सी उज्ज्वल
माँ भारती प्यारी इठलाती रातों में खूब बेला फूल।।
चाँद देखते ही खिल जाये रातों में खुश्बू बिखराये
बड़े समय पर खिले आज मेरे बरजे ये सारे फूल।।
धूप कड़ी हो रात घनी या वर्षा पड़े मूसलाधार!
रंग घोलता महक लुटाता हरदम ही हर फूल।।
बच्चे, तितली, भंवरे, या मानव सबके ही प्यारे
सब ही लुत्फ़ उठाते और फिर जाते हैं भूल।।
सदियों से हर बाग़ का रहा बस ये ही एक उसूल
जिसको खिलना आ गया वो ही मिट्टी का फूल।।

- गरिमा सिंह

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले
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