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ग़ज़ल

युवा कविता

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हवाओं का रुख कुछ बदलने लगा है ।।
        
                                                    
                            
चाँद भी देर से अब निकलने लगा है ।।

जो दूसरों का , था खाब अब तक,
खुद ही किसी पर मचलने लगा है ।।

किसी बात की तो है फ़िक्र उसको,
सड़क पर वो बेसुध टहलने लगा है ।।

अब न टिकेगा सच इस जहाँ में ,
खुद आईना आईने से डरने लगा है ।।

शायरी, इश्क, उसपे ग़म दूसरों का,
बेबस नशा क्या - क्या करने लगा है ।।


रवि शंकर सिंह ‘मंथन’
 
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5 वर्ष पहले
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