हवाओं का रुख कुछ बदलने लगा है ।।
चाँद भी देर से अब निकलने लगा है ।।
जो दूसरों का , था खाब अब तक,
खुद ही किसी पर मचलने लगा है ।।
किसी बात की तो है फ़िक्र उसको,
सड़क पर वो बेसुध टहलने लगा है ।।
अब न टिकेगा सच इस जहाँ में ,
खुद आईना आईने से डरने लगा है ।।
शायरी, इश्क, उसपे ग़म दूसरों का,
बेबस नशा क्या - क्या करने लगा है ।।
रवि शंकर सिंह ‘मंथन’
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