यहां नजर भोर की है
जन शोर की है
पर तू जाग गया
एक साहूकार की, एक चोर की
जहां पर्वत है वहां अंधेरा है
वहीं पथ यात्री तेरा अगला डेरा है
आगे कुआं है पीछे खाई है
गिनती भी गिनना भूल गई
तूने इतनी बार मात खाई है
जहां निशा है उस और दिशा है
जब दिखे पानी की झलक
ऊपर हरियाली का फलक
जब दो दीवारों बीच से ,
दो पंख सहित से
आए रविसेन
तभी पथिक तुझे मिलेगा चैन
तभी पथिक तुझे मिलेगा चैन
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